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बिहार : सीएम की कुर्सी से नीतीश कुमार ने क्या पाया और क्या खोया, कैसे हो रहा मूल्यांकन

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: May 4, 2026, 3:07:09 PM

Bihar Politics: बिहार में लगभग दो  दशक तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार सीएम की कुर्सी भाजपा को सौंप कर और जदयू की कमान लगभग  निशांत कुमार को देकर दिल्ली चले गए हैं.  यह  अलग बात है कि दिल्ली में रहकर भी वह पटना में ही रहेंगे, क्योंकि बिहार की राजनीति से वह अपने को अलग कर पाएंगे, इसमें संदेह है.  लेकिन नीतीश कुमार के इस परिवर्तन  की विवेचना भी हो रही है, समीक्षा की जा रही ही.  उनकी अच्छाई और गलतियों  को भी इंगित किया जा रहा है.  इसी क्रम में समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने एक पोस्ट डाला है और कहा है कि नीतीश कुमार के शासनकाल को आखिर कैसे आंका जाए.  उन्होंने कहा है कि नीतीश कुमार जी लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है और निकट भविष्य में इसके टूटने की संभावना कम दिखाई देती है.  लेकिन किसी भी शासनकाल का असली मूल्यांकन उसकी अवधि से नहीं, बल्कि उसकी दिशा और उसके नैतिक प्रभाव से होता है.  सवाल यही है कि इतिहास नीतीश कुमार के दौर को किस रूप में याद करेगा। 

नीतीश कुमार ने दो स्तरों पर काम जरूर किया लेकिन 

इसमें संदेह नहीं कि उनके शासनकाल में दो स्तरों पर काम हुआ — एक, आधारभूत संरचना के स्तर पर; सड़क, पुल-पुलिया और प्रशासनिक ढाँचे में बदलाव। दूसरा, सामाजिक स्तर पर; विशेषकर महिलाओं, पिछड़े वर्गों और पंचायतों में भागीदारी बढ़ाने जैसे कदम.  व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान सामाजिक क्षेत्र में था.  दुख इस बात का है कि आज उसी दिशा को उलटने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. नीतीश जी गांधी जी का नाम सबसे अधिक लेने वाले नेताओं में रहे हैं.  उन्होंने बापू सभागार बनवाया, भव्य बापू टावर बनवाया और स्वयं को गांधीवादी राजनीति का प्रतिनिधि बताने की कोशिश भी की.  लेकिन गांधी जी ने जिन “पाँच पापों” की बात की थी, उनमें सबसे पहला था — “सिद्धांतहीन राजनीति”। आज अगर इसी कसौटी पर नीतीश जी की राजनीति को देखा जाए तो गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं. एक समय था जब वे नरेंद्र मोदी का चेहरा तक देखने को तैयार नहीं थे.  बिहार में उन्हें आने देने तक पर आपत्ति थी, जबकि उसी पार्टी के समर्थन से उनकी सरकार चल रही थी.  फिर राजनीति ने ऐसा करवट लिया कि वही नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी के चरण स्पर्श करते दिखाई दिए.  हम जैसे लोग, जिन्होंने लंबे समय तक उनके संघर्ष को अपना संघर्ष माना, उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले, उनके लिए वह दृश्य अत्यंत पीड़ादायक और अपमानजनक था. 

साथियों के साथ उनका व्यवहार भी सवालों के घेरे में

केवल राजनीतिक पलटाव ही नहीं, बल्कि अपने साथियों के साथ उनका व्यवहार भी सवालों के घेरे में रहा.  जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव या दिग्विजय सिंह , ये वे लोग थे, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाई। लेकिन अंततः वही लोग उपेक्षा, अपमान और अकेलेपन के शिकार हुए.  जॉर्ज साहब का अंतिम समय बड़ा कारुणिक रहा.  शरद यादव की राजनीतिक स्थिति और दिग्विजय सिंह के साथ हुआ व्यवहार ,यह सब नीतीश जी के राजनीतिक इतिहास का हिस्सा हैं और इन्हें भुलाना कठिन है.इतिहास किसी नेता का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं करता, बल्कि यह भी देखता है कि उसने अपने सिद्धांतों, अपने साथियों और अपने समाज के साथ कैसा व्यवहार किया।  इस मामले में नीतीश जी ने नई पीढ़ी के सामने सिद्धांत विहीन और अनैतिक राजनीतिक आचरण का नज़ीर पेश किया है. बल्कि यह भी कहा जाएगा कि जिन लोगों के आचरण, कर्म और सिद्धांत की इन्होंने दुहाई दी है, उन सबको अपमानित किया है. इसलिए नीतीश कुमार के शासनकाल का मूल्यांकन आसान नहीं होगा। शिवानन्द

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