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बिहार : अतीत की राजनीति को वर्तमान के चश्मे से देख शिवानंद तिवारी ने क्यों कहा - Samrat will be the king

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 15, 2026, 12:58:58 PM

TNP DESK- बिहार में अभी राज्यसभा के अलावे इस बात की चर्चा तेज है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? नीतीश कुमार तो राज्यसभा जा रहे हैं, पॉलिटिकल सर्कल में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं.  उम्मीद तो यही है कि भाजपा का ही कोई मुख्यमंत्री बनेगा।  इन चर्चाओं के बीच बिहार के धाकड़ नेता माने जाने वाले  पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी ने एक फेसबुक पोस्ट किया है.  जिसमें उन्होंने कहा है कि अगले मुख्यमंत्री की राह की ओर सम्राट चौधरी बढ़ रहे हैं. 
उन्होंने अपने पोस्ट में कहा है कि नीतीश जी का राज्य सभा में जाना लगभग तय है. उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, इसकी चर्चा हो रही है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगला मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी का ही होगा. 

शिवानंद तिवारी का दावा  -सबकुछ हो रहा साफ़ ---

भाजपा का  कौन होगा, यह भी लगभग तय दिखाई दे रहा है. पूर्व के दो उपमुख्यमंत्रियों की जगह भाजपा ने सम्राट चौधरी के रूप में एक ही उपमुख्यमंत्री रखा है. सम्राट चौधरी  का गृहमंत्री होना भी इनके पक्ष में ही जाता है. कभी-कभी लगता है कि यह सब नीतीश जी की योजना के अनुसार ही हो रहा है. ऐसा क्यों !इसका उत्तर खोजने के लिए हमें अतीत में जाना होगा. जब लालू जी के साथ जुड़े रहना संभव नहीं रहा, तब विकल्प में समता पार्टी बनी थी. लालू यादव का आधार बहुत मज़बूत था. यादव और मुस्लिम यही दोनों अपने आप में मज़बूत सामाजिक गठजोड़ थे. मंडल कमीशन के उनके अभियान के कारण अन्य पिछड़ों में भी उनके प्रति आकर्षण का भाव था. लेकिन जब लालू जी के साथ रहना संभव नहीं रह गया तो उनके विरोध में एक मज़बूत सामाजिक गठबंधन बनाना एक चुनौती थी.

लालू प्रसाद से मोह भांग हुआ तो बानी थी समता पार्टी 
 
लेकिन धीरे-धीरे लालू जी से पिछड़ों का मोह भंग होने लगा था. संपूर्ण पिछड़ा समाज उनका समर्थन कर रहा था लेकिन सत्ता में साझेदारी किसी को मिल नहीं रही थी. उसी पृष्ठभूमि में समता पार्टी का जन्म हुआ था. जहां तक स्मरण है समता पार्टी के गठन की घोषणा 1994 में गांधी मैदान में हुई थी. उसका लक्ष्य लव-कुश यानी कुर्मी और कुशवाहा और अति पिछड़े समुदाय का राजनीतिक गठजोड़ बनाना था. उस रैली में कांग्रेस को छोड़कर शकुनी  चौधरी भी समता पार्टी में शामिल हुए थे. रैली में लालू यादव के खिलाफ  उनके तीखे हमले ने संपूर्ण बिहार के कुशवाहा समुदाय को समता पार्टी की ओर आकर्षित किया था.लव-कुश का यह समीकरण कमोबेश आज तक नीतीश जी के साथ क़ायम है. अब जब यह चर्चा चल रही है कि नीतीश कुमार राज्यसभा में जा सकते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि उनका राजनीतिक वारिस कौन होगा। 

समृद्धि यात्रा पर भी नीतीश कुमार दे रहे कुछ संकेत ---

इस समय वे समृद्धि यात्रा पर हैं और उनके साथ उनके कई मंत्रिमंडलीय सहयोगी भी चल रहे हैं.  लेकिन इस यात्रा के दौरान एक राजनीतिक संकेत भी देखने को मिला. सम्राट चौधरी के प्रति नीतीश कुमार का सार्वजनिक व्यवहार भी ध्यान देने योग्य है. पूर्णिया में एक कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने जिस तरह सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें आगे बढ़ाया, उससे यह संकेत मिलता है कि वे उन्हें अपने संभावित उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।यदि ऐसा होता है तो इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि जिन सामाजिक समूहों—विशेषकर लव-कुश—के सहारे उन्होंने वर्षों तक सत्ता चलाई, सत्ता छोड़ते समय उसी सामाजिक आधार को अपने वारिस के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश तो कर ही रहे हैं.  साथ-साथ लंबे समय तक साथ निभाने के लिए अपनी बागडोर सम्राट  चौधरी को सौंप कर वे कुशवाहा समाज प्रति अपनी कृतज्ञता भी ज्ञापित कर रहे हैं. अब परीक्षा सम्राट की है !! शिवानन्द

रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 

Tags:DhanbadBiharPoliticsCMRajyasabha

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