TNP DESK- बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चौथी बार जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं. लेकिन इस बार वह बिहार से दूर दिल्ली में बैठकर जदयू की राजनीति की गोटी फिट करेंगे। नीतीश कुमार अब राज्यसभा जा रहे हैं. राज्यसभा का चुनाव उन्होंने जीत लिया है. यह बात भी सच है कि पार्टी की स्थापना के समय से ही जदयू की राजनीति नीतीश कुमार के अगल-बगल घूमती रही है. नीतीश कुमार पहली बार 2016 में और फिर 2023 में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. अब वह चौथी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बने है.
2003 में समता पार्टी के बाद जदयू का गठन हुआ था
2003 में समता पार्टी के बाद जदयू का गठन हुआ. सबसे पहले अध्यक्ष शरद यादव रहे. शरद यादव के रहते भी पार्टी की राजनीति नीतीश कुमार के अगल-बगल ही थी. फिर 2016 में नीतीश कुमार पार्टी का नेतृत्व संभाला। यह अलग बात है कि नीतीश कुमार के रहते हुए भी बिहार में जदयू ने कई उतार-चढ़ाव देखे। लेकिन नीतीश कुमार की राजनीतिक परिपक्वता से पार्टी सभी चुनौतियों से निकल गई. जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार के पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते दो लोकसभा और दो विधानसभा का चुनाव लड़ा गया. इनमें 2020 और 2025 का विधानसभा चुनाव और 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव भी शामिल है. 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू को केवल 43 सीट मिली। इसके बाद भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने.
2025 में भी पार्टी को मिली बड़ी सफलता
इसके बाद 2025 में जदयू ने 100 सीटों पर लड़कर 85 पर जीत हासिल की और यह बड़ी सफलता कही जाती है. हालांकि 2010 में जदयू ने सर्वाधिक 110 सीट अपने नाम किया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में जदयू ने 24 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 16 पर जीत मिली। 2024 के लोकसभा चुनाव में 16 सीटों पर लड़कर 12 सीट अपने पास कर ली. अब सवाल उठता है कि नीतीश कुमार भले ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं, लेकिन अब वह दिल्ली में रहेंगे और वहीं से बिहार की राजनीति को देखेंगे। हालांकि यह बात भी कहीं जा रही है कि नीतीश कुमार के बाद कौन मुख्यमंत्री होगा? किसकी पीठ पर नीतीश कुमार का हाथ होगा? बिहार की राजनीति कैसे चलेगी? जदयू क्या करेगा? यह सब बड़े सवाल हैं.
राज्यसभा का शपथ लेने के साथ ही क्या देंगे इस्तीफा ---?
राज्यसभा का शपथ लेने के साथ ही नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे या कुछ दिन मुख्यमंत्री बने रहेंगे। इस पर अभी अटकलें चल रही हैं. अटकल तो इस बात पर भी चल रही है कि आखिर मुख्यमंत्री का वारिस कौन होगा? क्या नीतीश कुमार ही वारिस तय करेंगे या भाजपा पर छोड़ देंगे? इतना तो तय है कि नीतीश कुमार का पुत्र भी अब राजनीति में आ गए हैं और बिहार की राजनीति की नब्ज को अच्छी तरह से जानने - समझने वाले नीतीश कुमार यह अभी जानते होंगे कि निशांत कुमार को बिहार की राजनीति में सफल होना उतना आसान नहीं हो सकता है. इसके लिए नीतीश कुमार आगे क्या करेंगे, यह देखने वाली बात होगी।
रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो