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दस साल की उम्र से ही प्रतिभा बिखेरने वाले रामचंद्र मांझी के बारे में नीतिश ने कहा- दिलाई भोजपुरी नृत्‍य को अंतरराष्‍ट्रीय पहचान

BY -
Shahroz Quamar
Shahroz Quamar
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 6:11:52 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के  ‘लौंडा’ नाच का अंतिम सिरा भी मानो टूट गया। उनके शुरुआती संगी-साथी, मशहूर अभिनेता और लोक नर्तक रामचंद्र मांझी का आज 96 वर्ष की आयु में देहावसान हो  गया। लोक गायिका चंदन तिवारी कहती हैं, ‘मांझी जी जस कलाकार के देह भर ही छूटी, बाकि उहां के हमेशा लोकस्मृति में जीवंत रहब।‘ बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने अपनी शोक-संवदेना व्यक्त करते हुए कहा कि उन्‍होंने भोजपुरी नृत्‍य को अंतरराष्‍ट्रीय पहचान दिलाई।  सांसद राजीव प्रताप रूडी और सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल और कला संस्कृति मंत्री जितेंद्र राय समेत सभी प्रमुख लोगों ने रामचंद्र मांझी के निधन पर शोक व्यक्त किया है.

पटना के आईजीआईएमएस अस्पताल में बुधवार देर रात रामचंद्र मांझी ने अंतिम सांस ली. इधर वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. मंत्री जितेंद्र राय की पहल पर उन्‍हें आइजीआइएमएस में भर्ती कराया गया था. पांच दिनों से वे इलाजरत थे. रामचंद्र मांझी के शव को अंतिम दर्शन के लिए उनके गांव में रखा गया है.

रामचंद्र मांझी सारण जिले के नगरा प्रखंड क्षेत्र के तुजारपुर के रहने वाले थे. लगभग 10 वर्ष की उम्र से ही अपनी कला प्रतिभा बिखेरने लगे थे. जल्द ही वे भिखारी ठाकुर के सम्पर्क में आ गए. उनके साथ करीब 30 वर्षों तक वे कला के क्षेत्र में अप जलवा दिखाते रहे. भिखारी ठाकुर के देहांत के बाद भी उनकी परम्परा को जीवित रखने का श्रेय रामचंद्र मांझी को ही जाता है. उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी ‘बिदेशिया’ और ‘बेटी-बेचवा’ के प्रसंग से दर्शकों को भावविभोर कर देते थे. 2017 में इन्हें संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार.  2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. लेकिन कहा जाता है कि अंतिम दिनों वो बेहद आर्थिक संकटों का सामना कर रहे थे.

 

 

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