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कौन हैं शुभेंदु अधिकारी? जिनकी रणनीति से BJP ने बंगाल में गिराया 15 साल पुराना मजबूत किला

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: May 9, 2026, 1:56:20 PM

TNP DESK- बंगाल में भाजपा  राज शुरू हो गया.  आजादी के बाद पहली बार बंगाल में किसी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह लोक भवन से निकलकर खुले मैदान में आयोजित हुआ. शुभेंदु अधिकारी के साथ पांच मंत्रियों ने शपथ ली है.  जिनमें  दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक किर्तनिया, खुदीराम टुडू और निशीथ प्रमाणिक शामिल हैं.  लेकिन वार्ड पार्षद से मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाले सुभेंदु  अधिकारी के संघर्ष की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.  छात्र आंदोलन से उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू हुई.  1995 में वह कांग्रेस में शामिल हुए और पार्षद का चुनाव जीता।  1998 में ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस छोड़ा  और तृणमूल  कांग्रेस में शामिल हुए.  2006 में तृणमूल कांग्रेस से पहली बार विधायक बने. 

2009 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने
 
2009 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने.  2020 में तृणमूल कांग्रेस छोड़ी और भाजपा का हिस्सा बने.  2021 में नंदीग्राम से ममता को हराया और नेता प्रतिपक्ष बने.  2026 में भवानीपुर से ममता बनर्जी को हराया और बंगाल के मुख्यमंत्री बने.  अब आप जानना चाहेंगे कि आखिर कौन है शुभेंदु अधिकारी, जो छात्र आंदोलन से पार्षद और फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे।  सुभेंदु  अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में हुआ , वह एक बेहद मजबूत राजनीतिक परिवार से आते हैं.  उनके पिता शिशिर अधिकारी, मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रह चुके हैं.  पूर्व मेदिनीपुर क्षेत्र में उनके परिवार का गहरा प्रभाव है.  उनके भाई दिव्यांशु और सौमेंदु भी सांसद  और नेता के रूप में सक्रिय हैं. 

राजनीति में एंट्री भी कांग्रेस के रास्ते कैसे हुई थी 
 
बताया जाता है कि शुभेंदु अधिकारी की राजनीति में एंट्री कांग्रेस के रास्ते हुई.  1995 में अपने पिता के रास्ते चलते हुए कांग्रेस में शामिल हुए.  इसी साल वह पार्षद चुने गए.  1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाई तो सुभेंदु  अधिकारी तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा बन गए.  जानकार यह भी  बताते हैं कि सुभेंदु  अधिकारी के जीवन में बड़ा मोड 2007 में आया.  उन्होंने बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार की  नंदीग्राम में ऐतिहासिक भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की कमान संभाली और इस आंदोलन का नेतृत्व किया।  इसी आंदोलन ने बंगाल में 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका और 2011 में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई. हालांकि ममता बनर्जी की भी इसमें बड़ी भूमिका रही.  2009 में पहली बार शुभेंदु  अधिकारी सांसद बने. 

पार्टी में घटते कद से आहत शुभेंदु अधिकारी ने छोड़ दी पार्टी 

 लोग बताते हैं कि शुभेंदु अधिकारी का तृणमूल कांग्रेस में मजबूत पकड़ थी.  उनकी छवि तृणमूल  कांग्रेस में ममता दीदी के बाद  नंबर दो नेता की बन गई थी.  लेकिन ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में बढ़ता कद और प्रभाव से वह  आहत  रहने लगे थे.  अभिषेक बनर्जी को पार्टी प्रबंधन की अधिक जिम्मेदारियां दी जा रही थी.  जिसे शुभेंदु अधिकारी अपने को कमजोर महसूस करने लगे थे.  इसके अलावे 2019 में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का प्रभाव भी बढ़ने लगा था.  जिसको लेकर शुभेंदु  अधिकारी के मतभेद थे.  इन मतभेदों के चलते उन्होंने पार्टी के कार्यक्रमों और कैबिनेट की बैठकों से भी दूरी बनानी  शुरू कर दी थी.  यह  अलग बात है कि तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के पहले उन्हें मनाने के भी प्रयास किए गए.  लेकिन 2020 में उन्होंने एक-एक कर अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।  फिर 19 दिसंबर 2020 को शुभेंदु अधिकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हो गए और अब तो बंगाल के मुख्यमंत्री हैं. 

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