टीएनपी डेस्क (TNP DESK): ‘देख लीजिए हमारी गुंडागर्दी, हम हैं NTPC के दलाल, हम हैं सब रैयतों पर भारी’. शान से बोलिए—झारखंड पुलिस ज़िंदाबाद!” यह कथन हमारे नहीं बल्कि बड़कागाँव की पूर्व विधायक अम्बा प्रसाद के हैं. अम्बा प्रसाद और NTPC से जुड़ा विवाद किसी से छुपा नहीं है. वहीं हालही में मामले ने तूल तब पकड़ा जब NTPC द्वारा खनन को लेकर अम्बा का घर ढाह दिया गया था. इसके बाद अम्बा रोजाना प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए ना सिर्फ NTPC बल्कि सरकार को भी आड़े हाथ लेती आई हैं. उन्होंने हमेशा ही रैयातों की जमीन के बदले मुआवजे की मांग को मुखरता से रखा है वहीं आज भी इसी मांग को लेकर वह अपनी आवज बुलंद कर रही है. NTPC पर मनमाने ढंग से काम करने और गुंडागर्दी की सारी हदें पार करने के बाद अब अम्बा लगातारसरकार को भी घेरती हुई नजर आ रहीं हैं. ऐसे में एक बार चर्चा का विषय बना है उनका हालिया ट्वीट जो उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडेल X पर पोस्ट किया है. इस पोस्ट में उन्होंने लिखा, “लाल, उजली और नीली वैन, उस पर चमकती लाइटें, साथ में रूह कँपा देने वाली सायरन की आवाज़ें; चल पड़ी है झारखंड पुलिस की नई सवारी। बदन पर लिखा है—‘आपकी सुरक्षा, हमारी ज़िम्मेदारी’ "मेरा एक सवाल है—यह 'आप' है कौन? नागरिक तो नहीं है। यदि होता, तो लिखा जाता: 'नागरिक सुरक्षा, हमारी ज़िम्मेदारी'।"। दो-चार लाइनें हम भी जोड़ देते हैं, जो उसी गाड़ी पर लिखिएगा: ‘देख लीजिए हमारी गुंडागर्दी, हम हैं NTPC के दलाल, हम हैं सब रैयतों पर भारी’। शान से बोलिए—झारखंड पुलिस ज़िंदाबाद!” #jharkhandpolice
इस पूरी घटना ने झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ NTPC की परियोजना है जिसे क्षेत्र के विकास से जोड़ा जाता है तो वहीं दूसरी ओर स्थानीय रैयतों के अधिकार, उनकी जमीन और पुनर्वास का मुद्दा उतनी ही मजबूती से सामने आता है. अम्बा लगातार इस बात को उठाती रही हैं कि विकास की कीमत आम लोगों को उनके घर-बार से बेदखल करके नहीं चुकाई जा सकती. उनके हालिया बयान और सोशल मीडिया पोस्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि आखिर प्रशासन और पुलिस की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए.
हालांकि अब यह मामला केवल एक राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य में विकास बनाम विस्थापन की पुरानी बहस को फिर से ताज़ा कर दिया है. ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमा सकता है, क्योंकि एक ओर जनप्रतिनिधि खुलकर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रभावित लोग न्याय और उचित मुआवजे की उम्मीद लगाए बैठे हैं.