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दादी-पोते की अद्भुत कहानी: बिहार के इस 19 साल के लड़के की क्यों हो रही है श्रवण कुमार से तुलना?

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: April 20, 2026, 2:16:29 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): दादा-पोते के बीच प्यार, लगाव और जुड़ाव की कहानी कई बार सुनने को मिलती है. लेकिन हम आपको एक ऐसी बात बताने जा रहे हैं, जिस पर आपके कानों को भी भरोसा नहीं होगा. बिहार के हाजीपुर के इस लड़के ने तो एक उदाहरण पेश कर दी. परीक्षा छोड़ दी, लेकिन दादी की जान बचाना उसके लिए प्राथमिकता बन गई. उसने अपनी किडनी दादी के लिए दे दी. दादी और पोता दोनों स्वस्थ हैं. इस लड़के की चर्चा अब खूब हो रही है. गंभीर बीमारी से जूझ रही दादी की जान अब बच गई है. उसे नया जीवन मिल गया है.  

पोते की उम्र मात्र 19 साल है,उसने अपनी बोर्ड परीक्षा छोड़ दी

पोते की उम्र मात्र 19 साल है. इसके लिए उसने अपनी बोर्ड परीक्षा छोड़ दी. दादी की जान बचाने के लिए अपना लिवर डोनेट कर दिया. दरअसल, बिहार के हाजीपुर के रहने वाली 62 वर्षीय महिला सुनीता देवी को 31 जनवरी 2026 को गंभीर हालत में गाजियाबाद के मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था. सुनीता देवी लिवर सिरोसिस बीमारी से पीड़ित थी. उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी. परिजनों से बात कर लिवर ट्रांसप्लांट करने पर सहमति बनी. लिवर डोनेट करने के लिए बेटे-बहू की भी जाँच की गई लेकिन वह सही नहीं पाए गए. इसके बाद 19 वर्षीय पोते आदित्य राज ने दादी को अपना लिवर दान देने की इच्छा व्यक्त की. डॉक्टर ने उसका लिवर सही पाया. 

17 फरवरी को आदित्य और उसकी दादी को अस्पताल से छुट्टी दी गई

परिजनों ने भी इसकी सहमति दे दी. इसके बाद लिवर ट्रांसप्लांट किया गया. 2 फरवरी को सफल प्रत्यारोपण हुआ और इसके बाद दो सप्ताह तक दोनों को कड़ी निगरानी में रखा गया. 17 फरवरी को आदित्य और उसकी दादी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. डॉक्टरो  के अनुसार आदित्य के आगे के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, आदित्य अपने परिवार के साथ हाजीपुर में ही रहते है. उनके पिता खेती करते हैं. आदित्य हाजीपुर के ही एक विद्यालय में 12वीं में पढ़ाई कर रहे हैं. आदित्य के अनुसार 17 फरवरी को अस्पताल से छुट्टी मिली थी और इसी दिन से बिहार में उनकी सीबीएसई बोर्ड की 12वीं की परीक्षा थी. डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक उन्होंने जल्दबाजी नहीं की और परीक्षा छोड़ दी. यह बहुत कठिन फैसला था, लेकिन पूरा परिवार ने उनका साथ दिया. 

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