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इस रहस्यमय मंदिर में बना है अद्भुत स्वर्ण मंडप, यहां साल में एक बार दिखता है चंद्रमा, जानिए क्या है खास  

BY -
Purnima
Purnima
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 5:07:28 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : दुनिया में आज भी कुछ ऐसे रहस्य है जिन्हें सुलझाया नहीं गया. कई ऐसी जगह है जिन्हें भले ही सात अजूबों में शामिल न किया गया हो मगर वो किसी अजूबे से काम नहीं है. कई रहस्यमय मंदिर है जिनके बारे में सुन आप हैरान हो जाएंगे. इस आर्टिकल में हम आपको एक ऐसी ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे है. इस मंदिर से जुड़े ऐसे कई कारण है जिन्हें जानना और देखना दिलचस्प होगा. महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में स्थित 1200 साल पुराना कापेश्वर मंदिर का निर्माण अपने आप में ही एक रहस्य है.

स्वर्ण मंडप के मध्य में दिखता है चंद्रमा

इस तपेश्वरी मंदिर में एक स्वर्ण मंडप बना हुआ है. इस मंदिर के बने स्वर्ण मंडप को देखा आप दंग रह जाएंगे इस स्वर्ण मंडप को ऐसे बनाया गया है कि केवल कार्तिक पूर्णिमा की रात को ही साल में सिर्फ एक बार चंद्रमा इस स्वर्ण मंडप के मध्य में होता है. ऐश्वर्या की बात यह है कि यह सिर्फ कार्तिक पूर्णिमा के रात को ही होता है.

1200 साल पहले हुआ निर्माण

इस मंदिर की एक और हैरान कर देने वाली बात है और वह यह है कि 1200 साल पहले उन प्राचीन भारत के लोगों ने ईश्वर मंदिर को बनाया और इस मंडप का निर्माण किया जब हजारों साल पहले मशीन का जमाना ही नहीं था. तभी ऐसी एक भी मशीन नहीं थी जिसकी मदद से इमारतों को बनाया जा सके. सिर्फ हाथ के ही कारीगरी से इसे बनाया गया है. जो कि अपने आप में अद्भुत है.

महादेव का सूर्य अभिषेक

इस मंदिर के अंदर दो शिवलिंग है इनमें एक भगवान शिव की मूर्ति है और दूसरा भगवान विष्णु इसमें स्थापित है. इन दोनों मूर्तियों पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती है ऐसा कहा जाता है कि सूर्य की किरणों से हर दिन महादेव का सूर्य अभिषेक होता है. इस मंदिर के अंदर बने स्वर्ण मंडप ठीक मंदिर के बीचों बीच है जो ऊपर से गोलाकार आकार में खुला हुआ है यहां से कार्तिक महीने में चांद बीचो-बीच दिखता है इसके साथ ही हर दिन सूर्य की किरणें इसके ठीक नीचे स्थापित शिवलिंग और विष्णु की मूर्ति पर पड़ती है.

कन्नड़ भाषा में लिखे हुए हैं शिलालेख

इस मंदिर परिसर में आपको कई शिलालेख देखने को मिलेंगे जो प्राचीन इतिहास से लोगों को रूबरू करवाता है. हालांकि इन 12 शिलालेख में अब कुछ ही शिलालेख बचे है. दो या तीन शिलालेख ही अभी यहां पर मौजूद हैं. जिनमें कुछ राजाओं और उनके अधिकारियों के नाम अंकित है. खास बात तो यह है कि सिर्फ एक ही नाम संस्कृत और देवनागरी में लिखा हुआ है बाकी सभी शिलालेख कन्नड़ भाषा में लिखे हुए हैं.

शोधकर्ता भी होते हैं आश्चर्यचकित 

ईश्वर मंदिर के नीचे नौ ग्रहों के नौ कलाकृतियां बनी हुई है जो काफी लुभावनी है. इस मंदिर की खूबसूरती ऐसी है कि इसे देख आज भी शोधकर्ता यही सोचते हैं कि आखिरकार इसे कैसे बनाया गया होगा. ये मंदिर 3 डी की तरह दिखता है. इसमे बनी कलाकृति बाहर की तरह उभरी हुई है. जो काफी खूबसूरत है.

इन राजाओं ने करवाया था मंदिर का निर्माण

इस मंदिर के बारे में बता दें कि 12वीं शताब्दी में शैलाहार वंश के राजा गंधारादित्य द्वारा बनाया गया था. कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव और विष्णु को समर्पित है.  इस मंदिर के निर्माण को लेकर विभिन्न बातें कही जाती हैं कहा जाता है की सातवीं शताब्दी में बदामी चालुक्य वंश के राजाओं, 9वीं शताब्दी में कल्याणी चालुक्य वंश के राजाओं और 12वीं शताब्दी में शैलहर वंश के राजाओं ने इसका निर्माण करवाया था.

 

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