TNP DESK-भोजपुरी दुमका प्रखंड अंतर्गत टीकापहाड़ी गांव में दिसोम मरांग बुरु युग जाहेर अखड़ा एवं ग्रामीणों द्वारा संताल आदिवासी समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व बाहा धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। पूरे गांव में पारंपरिक नृत्य, गीत और पूजा अर्चना के साथ प्रकृति के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई।
प्रथम दिन ‘जाहेर दाप माह’: पूजास्थल की तैयारी
तीन दिवसीय बाहा पर्व के पहले दिन पूज्य स्थल जाहेर थान में छावनी बनाकर स्थल की साफ सफाई और पूजा की तैयारी की जाती है। इस दिन पूरे गांव में पर्व की शुरुआत का माहौल बनता है और लोग आगामी अनुष्ठानों के लिए स्वयं को तैयार करते हैं।
द्वितीय दिन ‘बोंगा माह’: पूजा, नृत्य और फूल वितरण
दूसरे दिन ग्रामीण नायकी (पुजारी) को नाच गान के साथ उनके घर से जाहेर थान तक ले जाते हैं। वहां बोंगा दारी एवं सारजोम (सखुवा) पेड़ के नीचे पूज्य स्थलों का गोबर और पानी से शुद्धिकरण किया जाता है, जिसे गेह गुरिह कहा जाता है। इसके बाद सिंदूर, काजल, महुआ और सखुवा के फूल अर्पित कर देवी देवताओं की पूजा तथा बलि दी जाती है। नायकी सभी ग्रामीणों को सखुवा का फूल देते हैं, जिसे पुरुष कान में और महिलाएं बालों में लगाती हैं। तुन्दाह और टमाक की थाप पर बाहा नृत्य प्रस्तुत किया जाता है तथा प्रसाद वितरण के बाद नायकी को पुनः नाच गान के साथ गांव लाया जाता है, जहां वे हर घर में फूल प्रदान करते हैं।
तृतीय दिन ‘शरदी माह’: सादा पानी से उत्सव
अंतिम दिन ग्रामीण सुबह से ही एक दूसरे पर सादा पानी डालकर बाहा पर्व का आनंद लेते हैं। संताल समाज की मान्यता है कि बाहा केवल सादा पानी से ही खेला जाना चाहिए और रंगीन पानी का प्रयोग परंपरा के विरुद्ध है। पूर्वजों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार रंगों का उपयोग इस पर्व में नहीं किया जाता। पुराने समय में किसी कुंवारी लड़की पर रंग डालना अशुद्ध माना जाता था और इसके लिए दंडस्वरूप पांच बकरियां देने की सजा भी दी जाती थी।
सामूहिक भोज के साथ पर्व का समापन
पर्व के अंत में सभी ग्रामीण एक दूसरे के घर जाकर सामूहिक भोजन करते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत करते हैं। इस अवसर पर नायकी सोनालाल हेम्ब्रम सहित बबलु हेम्ब्रम, ओम प्रकाश हेम्ब्रम, प्रेम मुर्मू, दिनेश टुडू, रुबीन टुडू, लिली टुडू, निर्मला सोरेन, नरेश मुर्मू समेत बड़ी संख्या में महिला पुरुष उपस्थित रहे।
