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झारखंड के 5 आदिवासी सूरमा, जिनके विद्रोह से कांप उठी थी अंग्रेजी हुकूमत

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): 15 अगस्त सिर्फ तिरंगा फहराने और आजादी का जश्न मनाने का दिन नहीं है. यह उन वीरों को याद करने का भी मौका है, जिन्होंने अपनी मिट्टी, अपने अधिकार और देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. जब अंग्रेज भारत के संसाधनों और जमीन पर अपना कब्जा मजबूत कर रहे थे, तब झारखंड के जंगलों और पहाड़ों से उनके खिलाफ विद्रोह की आवाज उठ रही थी.

झारखंड की धरती ने ऐसे कई आदिवासी योद्धाओं को जन्म दिया, जिन्होंने कभी हथियार उठाकर तो कभी अहिंसा के रास्ते पर चलकर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी. किसी ने तीर-कमान से अंग्रेजी अफसरों को चुनौती दी, तो किसी ने हजारों लोगों को एकजुट कर अंग्रेजों की राजस्व व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया. स्वतंत्रता दिवस पर आइए जानते हैं ऐसे ही 5 महान आदिवासी नायकों के बारे में.

1. भगवान बिरसा मुंडा: उलगुलान से अंग्रेजों की बढ़ी बेचैनी
छोटानागपुर की धरती के महानायक भगवान बिरसा मुंडा ने आदिवासियों के अधिकारों और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजों और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया. उनके नेतृत्व में 'उलगुलान' यानी महान विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की नींव को चुनौती दी. बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज को एकजुट किया और जमींदारों तथा अंग्रेजी प्रशासन की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की. उनका प्रभाव इतना बढ़ गया था कि ब्रिटिश प्रशासन उन्हें पकड़ने के लिए लगातार अभियान चलाने लगा. कम उम्र में ही उनकी मृत्यु अंग्रेजों की हिरासत में हुई, लेकिन उनका संघर्ष आज भी झारखंड की पहचान और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक माना जाता है.

2. बाबा तिलका मांझी: तीर से अंग्रेजी सत्ता को दी चुनौती
अंग्रेजों के खिलाफ शुरुआती सशस्त्र विद्रोहों में बाबा तिलका मांझी का नाम बेहद अहम है. 18वीं सदी के अंतिम दौर में उन्होंने संथाल परगना क्षेत्र में अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ लोगों को संगठित किया. तिलका मांझी अपनी तीरंदाजी और साहस के लिए प्रसिद्ध थे. ब्रिटिश अधिकारी ऑगस्टस क्लीवलैंड पर तीर चलाने की घटना ने अंग्रेजी प्रशासन को हिला दिया था. इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए अभियान चलाया. गिरफ्तारी के बाद उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं और अंततः फांसी दे दी गई. उनका नाम आज भी झारखंड-बिहार की धरती के शुरुआती आदिवासी विद्रोहों के साथ सम्मान से लिया जाता है.

3. सिदो-कान्हू: एक आवाज पर हजारों योद्धा हुए एकजुट
30 जून 1855 को भोगनाडीह से शुरू हुआ संथाल हूल ब्रिटिश शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ सबसे बड़े आदिवासी आंदोलनों में गिना जाता है. सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया. अंग्रेजों, महाजनों और जमींदारी शोषण के खिलाफ दोनों भाइयों ने संथाल समाज को एकजुट किया. देखते ही देखते हजारों लोग धनुष-बाण और पारंपरिक हथियारों के साथ आंदोलन में शामिल हो गए. विद्रोह इतना व्यापक हुआ कि ब्रिटिश प्रशासन को इसे दबाने के लिए बड़ी सैन्य ताकत और कड़े कदम उठाने पड़े. सिदो-कान्हू का संघर्ष आज भी आदिवासी स्वाभिमान, अधिकार और प्रतिरोध की मिसाल माना जाता है.

4. जतरा टाना भगत: बिना हथियार अंग्रेजों से लिया लोहा
झारखंड के स्वतंत्रता संघर्ष की कहानी केवल हथियारों और युद्ध तक सीमित नहीं है. जतरा टाना भगत ने अहिंसा और असहयोग के रास्ते से ब्रिटिश शासन को चुनौती दी. 1914 में शुरू हुए टाना भगत आंदोलन ने आदिवासी समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधार के साथ अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध की भावना को मजबूत किया. उनके नेतृत्व में लोगों ने अंग्रेजों को कर देने, बेगारी करने और ब्रिटिश वस्तुओं के इस्तेमाल का विरोध किया. जतरा टाना भगत का आंदोलन बाद में व्यापक स्वतंत्रता संघर्ष की विचारधारा से भी जुड़ा. बिना हथियार उठाए अंग्रेजी व्यवस्था का विरोध करना उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी.

5. वीर बुधु भगत: गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों को दी चुनौती
छोटानागपुर की धरती के वीर योद्धा बुधु भगत ने 1831-32 के कोल विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर ब्रिटिश शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया. बुधु भगत की रणनीति और लोकप्रियता से अंग्रेजी अधिकारी परेशान थे. उन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने इनाम तक घोषित किया था. अंग्रेजी सेना से घिरने के बावजूद उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मुकाबला जारी रखा. आखिरकार वे संघर्ष करते हुए शहीद हो गए, लेकिन उनका साहस और बलिदान झारखंड के इतिहास में हमेशा याद किया जाता रहेगा.

बिरसा मुंडा का उलगुलान, तिलका मांझी का साहस, सिदो-कान्हू का जनविद्रोह, जतरा टाना भगत का अहिंसक आंदोलन और बुधु भगत का संघर्ष झारखंड के इतिहास के ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता. इन आदिवासी नायकों ने अपने समय की ताकतवर ब्रिटिश सत्ता के सामने झुकने के बजाय अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष किया. स्वतंत्रता दिवस पर इन वीरों को याद करना सिर्फ इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि उनके साहस, एकता और बलिदान से प्रेरणा लेना भी है.