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TNP Special: बापू और झरिया के रामजस अग्रवाल की भेंट पर आज भी क्यों गर्व करता है धनबाद कोयलांचल, पढिए

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

धनबाद (DHANBAD): धनबाद की पहचान भले ही कोयला, खदान और कारोबार से होती हो, लेकिन झरिया की धरती ने आजादी के आंदोलन के भी कई महत्वपूर्ण अध्याय देखे हैं. इन्हीं अध्यायों में एक कहानी उस समय की है, जब महात्मा गांधी झरिया पहुंचे थे और शहर के प्रमुख समाजसेवी कारोबारी रामजस अग्रवाल के घर गए थे. आज करीब एक सदी बाद भी उस मुलाकात की एक निशानी उनके परिवार के पास सुरक्षित है, वही कुर्सी, जिस पर बैठकर बापू ने बातचीत की थी.कहानी वर्ष 1922 की बताई जाती है. उस समय देश असहयोग आंदोलन के दौर से गुजर रहा था. महात्मा गांधी और देशबंधु चित्तरंजन दास राष्ट्रीय आंदोलन के लिए लोगों से सहयोग जुटा रहे थे. इसी क्रम में झरिया जैसे समृद्ध कोयला क्षेत्र की ओर भी उनकी नजर गई. झरिया उस समय कोयला कारोबार का बड़ा केंद्र बन चुका था और यहां कई संपन्न कारोबारी रहते थे.

कोयला खान मालिक रामजस अग्रवाल के घर पहुंचे थे, तो क्या हुआ था 

इसी सिलसिले में गांधीजी झरिया के प्रमुख कोयला खान मालिक रामजस अग्रवाल के घर पहुंचे. स्थानीय पारिवारिक विवरण के मुताबिक उस समय गांधीजी को आंदोलन के लिए  आर्थिक जरूरत थी. उन्होंने रामजस अग्रवाल के सामने अपनी परेशानी रखी. रामजस अग्रवाल ने बिना देर किए उन्हें ब्लैंक चेक देते हुए कहा कि जितना जरूरत है , उतना राशि भर लें. गांधीजी ने चेक अपने हाथ में लिया और कुछ देर सोचने के बाद उसमें 50 हजार रुपये की राशि लिख दी. यह उस दौर की बहुत बड़ी रकम थी. लेकिन रामजस अग्रवाल ने यहीं बात खत्म नहीं की. चेक को दूसरे शहर में भुनाने में कोई परेशानी न हो, इसके लिए उन्होंने एक कागज पर हुंडी लिखकर गांधीजी को दी और कहा कि कोलकाता से कानपुर तक किसी भी संबंधित गद्दी पर इसे दिखाकर राशि प्राप्त की जा सकती है.इस मुलाकात की सबसे अनमोल निशानी हालांकि वह 50 हजार रुपये नहीं, बल्कि एक साधारण-सी कुर्सी बन गई.

बापू की बैठने वाली कुर्सी आज भी है परिवार की धरोहर 

परिवार के मुताबिक गांधीजी जब रामजस अग्रवाल के घर पहुंचे तो उन्हें इसी कुर्सी पर बैठाया गया था. बापू के जाने के बाद रामजस अग्रवाल ने परिवार के लोगों को इस कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया. धीरे-धीरे वह कुर्सी परिवार के लिए केवल फर्नीचर नहीं रही, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की एक जीवित स्मृति बन गई.आज भी परिवार ने उस कुर्सी को संभालकर रखा है. परिवार के सदस्य नंदन अग्रवाल के अनुसार, पीढ़ियां बदल गईं, घर का माहौल बदला, लेकिन उस कुर्सी को लेकर परिवार की भावना नहीं बदली. यहां तक कि चेन्नई के करीब सौ साल पुराने एक संग्रहालय ने भी गांधीजी से जुड़ी इस स्मृति को अपने संग्रह में रखने के लिए परिवार से कुर्सी मांगी थी.रामजस अग्रवाल केवल बड़े कारोबारी नहीं थे. वे झरिया के सामाजिक जीवन और राष्ट्रीय आंदोलन से भी जुड़े हुए थे. उन्होंने 1921 में झरिया में हुए अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) के दूसरे अधिवेशन के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनके योगदान का उल्लेख कोयला क्षेत्र के मजदूर आंदोलन के इतिहास में भी मिलता है.

एक नहीं दो बार झरिया आये थे महात्मा गांधी 

गांधीजी और रामजस अग्रवाल की मुलाकात भी केवल एक बार की कहानी नहीं रही. 12 जनवरी 1927 को गांधीजी दोबारा झरिया पहुंचे. परिवार के अनुसार इस बार भी वे रामजस अग्रवाल के घर गए और उन्हें आर्थिक सहयोग मिला. इसके अगले दिन वे कतरास पहुंचे, जहां बी. के. राय से भी सहयोग मिला.इसके बाद 1934 में भी गांधीजी के झरिया आने का उल्लेख मिलता है. आज झरिया की पुरानी तस्वीर काफी बदल चुकी है. कई पुराने मकान, रास्ते और खदानें समय के साथ बदल गए. लेकिन रामजस अग्रवाल के परिवार में सुरक्षित वह कुर्सी बीते दौर की एक कहानी कहती है.एक तरफ उस कुर्सी पर कभी देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति बैठा था, तो दूसरी तरफ सामने बैठा था झरिया का वह उद्योगपति, जिसने आंदोलन के लिए अपना धन खोल दिया था.करीब सौ साल बाद भी वह कुर्सी सिर्फ लकड़ी और लोहे का सामान नहीं है. वह झरिया के उस दौर की गवाह है, जब कोयले की कालिख के बीच आजादी की लौ भी जल रही थी.और शायद यही इस कहानी की सबसे खास बात है, गांधीजी चले गए, आंदोलन इतिहास बन गया, रामजस अग्रवाल भी नहीं रहे, लेकिन जिस कुर्सी पर बैठकर बापू ने झरिया की धरती पर आजादी की बात की थी, वह आज भी उसी शहर में एक परिवार के पास चुपचाप उस मुलाकात की गवाही दे रही है.