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दागी अफसरों को किसकी सिफारिश पर मिल जाती है मलाईदार पोस्ट? नेता प्रतिपक्ष पूछ रहे सवाल

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

रांची (RANCHI): झारखंड की सियासत में एक बार फिर पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवालों की सिलसिला गरमाता हुआ नजर आ रहा है. इसी बीच नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर निशाना साधते हुए अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर सरकार से कई गंभीर सवाल पूछे हैं. नेता प्रतिपक्ष ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर आरोप लगाया है कि राज्य में महत्वपूर्ण और संवेदनशील जिम्मेदारियां ऐसे अधिकारियों को क्यों दी जा रही हैं, जिनकी कार्यशैली या भूमिका पहले से ही विवादों में रही है. उन्होंने सरकार की नीयत और पुलिस व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए हैं.

बाबूलाल मरांडी ने सवाल उठाया कि झारखंड में योग्य, ईमानदार और बेदाग अधिकारियों की कमी नहीं है. इसके बावजूद महत्वपूर्ण पदों, संवेदनशील जिम्मेदारियों और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करने वाली एजेंसियों में विवादों से घिरे अधिकारियों की नियुक्ति क्यों की जाती है. उन्होंने कहा कि अधिकारियों की नियुक्ति का सीधा असर प्रशासन और जांच व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है. ऐसे में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन पदों के लिए अधिकारियों के चयन का आधार क्या है.

नेता प्रतिपक्ष ने पुलिस महानिदेशक यानी DGP की नियुक्ति को लेकर भी सरकार को घेरा है. उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कार्यकाल में UPSC की ओर से अनुशंसित अधिकारियों को अपेक्षित तरीके से जिम्मेदारी नहीं दी गई. मरांडी ने दावा किया कि एक अधिकारी को छोड़कर UPSC की अनुशंसा के बावजूद अन्य अधिकारियों को DGP नहीं बनाया गया. उनका यह भी आरोप है कि जिस अधिकारी को जिम्मेदारी मिली, उसे भी निर्धारित कार्यकाल से पहले हटा दिया गया. उन्होंने सवाल किया कि क्या राज्य में DGP जैसा महत्वपूर्ण पद अब तय नियमों और संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर तय होता है या फिर राजनीतिक पसंद-नापसंद का प्रभाव भी इसमें शामिल है.

मरांडी ने पुलिस अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव के संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि अगर किसी अधिकारी को यह महसूस हो कि उसकी कुर्सी कानून और नियमों से ज्यादा सत्ता के संरक्षण से सुरक्षित है, तो उसके फैसलों की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अधिकारी कानून के मुताबिक काम करने के बजाय राजनीतिक दबाव में फैसले लेने के लिए मजबूर हो सकता है. इसका सीधा असर आम लोगों के भरोसे और कानून-व्यवस्था पर पड़ता है.

बाबूलाल मरांडी ने झारखंड की जांच एजेंसियों CID और ACB का भी जिक्र किया. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर भ्रष्टाचार और गंभीर मामलों की जांच करने वाली एजेंसियों की कमान ही विवादित अधिकारियों के हाथों में होगी, तो आम जनता इन जांचों की निष्पक्षता पर भरोसा कैसे करेगी. उन्होंने सरकार से मांग की, कि जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रभाव से दूर रखा जाए और उनकी कमान ऐसे अधिकारियों को दी जाए जिनकी ईमानदारी और कार्यशैली पर कोई सवाल न हो.

मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पुलिस प्रशासन को राजनीतिक दबाव से मुक्त करने की अपील की. उन्होंने कहा कि सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन सरकारों के फैसलों का मूल्यांकन इतिहास करता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि पुलिस किसी सरकार, दल या नेता की निजी संस्था नहीं है. यह संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह व्यवस्था है. इसलिए अधिकारियों की नियुक्ति में राजनीतिक हित के बजाय योग्यता, ईमानदारी और निष्पक्षता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. मरांडी ने सरकार को आगाह करते हुए कहा कि अभी भी व्यवस्था में सुधार का समय है. अगर पुलिस और प्रशासन को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं किया गया, तो आने वाले समय में सवाल सिर्फ अधिकारियों पर नहीं बल्कि पूरी शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठेंगे.