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MLC चुनाव के बाद NDA में सब ठीक या सिर्फ दिखावा, JDU के दो उम्मीदवारों की एक जैसी हार, पार्टी ने भी उठाए सवाल

Manjesh Kumar Patna
Manjesh Kumar Patna
Senior News Publisher • TheNewsPost.in

पटना: बिहार विधान परिषद चुनाव के दौरान से ही बिहार की राजनीति में काफी हलचल जारी है. चुनाव प्रचार के दौरान पहले जदयू के अंदर ही उठापटक चली तो अब एनडीए में भी सबकुछ ठीक नहीं है. विधान परिषद चुनाव की घोषणा के बाद पार्टी के मोकामा से बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने नीरज कुमार का विरोध करते हुए जन सुराज प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में प्रचार किया. हालांकि इसके बावजूद नीरज कुमार तो जीत गए लेकिन अब निर्दलीय दो उम्मीदवारों पर बात बिगड़ने लगी है. दरअसल सारण शिक्षक निर्वाचन सीट और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के नवनिर्वाचित सदस्यों ने भाजपा की सदस्यता ले ली. हालांकि संविधान के नियमों के अनुसार फिर दोनों उम्मीदवारों ने सदस्यता लेने की बात से इनकार कर दिया और भाजपा को समर्थन करने की बात कही. इस मुद्दे पर जदयू के दोनों पराजित प्रत्याशियों ने भी नाराजगी जाहिर की और अब जदयू ने भी भाजपा पर नाराजगी जताई है.

जदयू प्रत्याशियों को हराने वाले को भाजपा में मिली जगह

दरअसल सारण शिक्षक सीट से भाजपा बागी राहुल राज ने निर्दलीय चुनाव लड़ कर जदयू के प्रत्याशी आनंद पुष्कर को हराया वहीं तिरहुत स्नातक सीट से निर्दलीय प्रत्याशी बंशीधर ब्रजवासी ने भी जदयू के प्रत्याशी अभिषेक झा को हराया. परिणाम के दो दिन बाद दोनों ही नवनिर्वाचित पार्षदों को भाजपा ने अपनी पार्टी की सदस्यता दिला दी. यहां बता दें कि भाजपा ने राहुल राज को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में 6 वर्षों के लिए निष्काषित कर दिया था लेकिन चुनाव जीतते ही वापस सदस्यता दिला दी. अब यह एक महज संयोग या सोची समझी साजिश, इसका खुलासा नहीं हुआ है. हालांकि संविधान के अनुसार भी निर्दलीय प्रत्याशी किसी दल को अपना समर्थन दे सकते हैं लेकिन सदस्यता नहीं ले सकते हैं. भाजपा के इस कदम पर अब जदयू के दोनों पराजित उम्मीदवारों ने मोर्चा खोल दिया है.

पार्टी और गठबंधन से नाराज हैं अभिषेक झा और आनंद पुष्कर

अपनी हार से आहत तिरहुत स्नातक सीट के प्रत्याशी अभिषेक झा ने किसी का नाम लिये बग़ैर मोर्चा खोल दिया और चुनाव में अकेले पड़ने की बात कही. उन्होंने कहा कि पार्टी और गठबंधन में माहौल ही कुछ ऐसा बनाया गया कि मैं अकेला हो गया. इस बात को लेकर अभिषेक झा और आनंद पुष्कर ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी बुलाईं लेकिन एन वक्त कर टाल दिया गया. अब माना जा रहा है कि 5 दिसंबर को जदयू की समीक्षा बैठक के बाद ही आगे कोई निर्णय लिया जाएगा.

देवेश चंद्र ठाकुर ने कहा नेताओं का दिल नहीं था साफ

दरभंगा स्नातक क्षेत्र से जदयू के प्रत्याशी अभिषेक झा ने साफ शब्दों में कहा कि पार्टी और गठबंधन में माहौल कुछ ऐसा बना दिया गया कि वह अकेले पड़ गए और चुनाव में हारना पड़ा. अभिषेक झा की बातों का सीतामढ़ी के सांसद और जदयू के वरिष्ठ नेता देवेश चंद्र ठाकुर ने भी समर्थन किया और कहा कि यह बात सही है. उन्होंने कहा कि इस चुनाव में बहुत से एनडीए नेताओं का दिल साफ नहीं था. उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि अभिषेक झा की बात में सच्चाई है. एनडीए के अंदर सहयोगी दलों के बहुत से नेताओं का दिल साफ नहीं था. उनकी अभिषेक झा से दुश्मनी नहीं थी. उनके सामने देवेश ठाकुर दिख रहे थे. उनके मन में था कि देवेश ठाकुर कमजोर समाज का होकर कद्दावर कैसे बनते जा रहा है. दुश्मनी इधर (मुझसे) थी, निशाना उधर (अभिषेक झा पर) था. लेकिन समय सबको देखता है, सबको मौका देता है. ऐसी बातों को कोई भूलता नहीं है. जिन लोगों से जिंदगी भर मदद ली, उन्हीं को धोखा देने का काम किया.

इतनी जल्दी वापसी की जल्दी क्या थी?

वहीं इस मामले को लेकर जदयू ने भी भाजपा से नाराजगी जाहिर की है. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने सवाल किया कि जिस व्यक्ति को पार्टी ने छह साल के लिए निष्कासित किया था, उसे इतनी जल्दी दोबारा शामिल करने की क्या जरूरत पड़ गई? भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व को इस पूरे मामले पर विचार करना चाहिए. हालांकि जदयू इस मामले को तूल देने के मूड में दिखाई नहीं दे रही है.

भाजपा ने किया नियमों का उल्लंघन

वहीं जदयू के एक अन्य विधायक और वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने भी बयान दिया. उन्होंने कहा कि किसी निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने का अधिकार राजनीतिक दलों के पास है. अगर भाजपा ने दोनों निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन दिया है, तो इसमें नियमों के उल्लंघन का सवाल नहीं है. लेकिन श्याम रजक ने चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतने के बाद किसी पार्टी में शामिल होना अनैतिक और गलत है. अगर दोनों एमएलसी भाजपा में शामिल हुए हैं, तो यह उचित नहीं है.

हालांकि अब यह देखना होगा कि 5 दिसंबर को आयोजित जदयू की समीक्षा बैठक में हार का कारण क्या निकल कर आता है. लेकिन यह सवाल राजनीतिक गलियारों में जरूर सुनाई दे रही है कि यह महज एक संयोग है या सोची समझी साजिश. बता दें कि विपक्ष भी इस मुद्दे को हाथ से जाने देना नहीं चाहता है और जदयू के दोनों उम्मीदवारों को भाजपा और जदयू के ही कुछ लोगों पर साजिश का आरोप लगा रहा है.

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