टीनपी डेस्क (TNP DESK): पेट्रोल-डीजल के दाम में लगातार इजाफा हो रहा है. जिससे आम आदमी की जेब पर एक बार फिर महंगाई का बड़ा बोझ पड़ा है. पिछले दो हफ्तों की बात करें तो सिर्फ दो हफ्तों के भीतर घरेलू तेल कंपनियों ने चौथी बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है. इस नए इजाफे के बाद देश की राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े महानगरों में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये के पार चली गई हैं, वहीं डीजल भी शतक लगाने के करीब पहुंच रहा है. अब इस बढ़ोतरी से हर कोई परेशान है और सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक बस एक ही सवाल गूंज रहा है की आखिर अचानक पेट्रोल और डीजल इतने महंगे क्यों होने लगे हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं इसके पीछे मुख्य कारण क्या हो सकता है.
- 'स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज़' का बंद होना
इस महंगाई के पीछे सबसे बड़ा वैश्विक कारण मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और तनाव है. 2026 में फरवरी के आखिर में शुरू हुए अमेरिका-इरान संघर्ष के बाद स्थिति बेहद गंभीर हो गई है. और यही वजह है की ईरान ने वैश्विक तेल व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते 'स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज़' (Strait of Hormuz) को ब्लॉक कर दिया है. बता दें, दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है. इस रास्ते के बंद होने से दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है. अंततः पेट्रोल-डीजल में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
- इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) का उछाल
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है. यही वजह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम अपने आप बढ़ जाते हैं. कुछ महीने पहले तक भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत लगभग 69 डॉलर प्रति बैरल थी. युद्ध के चलते हाल ही में ब्रेंट क्रूड की कीमतें उछलकर 120 से 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं. हालांकि पिछले एक-दो दिनों में इसमें मामूली गिरावट आई है और यह 100 डॉलर के नीचे आया है, लेकिन इसके बावजूद यह भारत के पुराने बजट से कहीं ज्यादा महंगा है.
- तेल कंपनियों का पुराना घाटा और 'अंडर-रिकवरी'
एक सवाल यह भी उठता है कि युद्ध तो फरवरी से चल रहा है, फिर दाम मई में क्यों बढ़ रहे हैं? दरअसल, सरकारी तेल कंपनियों (जैसे IOCL, BPCL, HPCL) ने पिछले लगभग चार साल से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखा था. चुनावी माहौल और आम जनता को महंगाई से बचाने के लिए कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम बढ़ने के बाद भी घरेलू कीमतें नहीं बढ़ाईं.
आपको बता दें, पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, यदि तेल कंपनियां कीमतें नहीं बढ़ातीं, तो चालू तिमाही में उन्हें 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हो सकता था. कंपनियां प्रति दिन सैकड़ों करोड़ का घाटा सह रही थीं. अब अपने उसी पुराने घाटे (Under-recoveries) को धीरे-धीरे वसूलने के लिए कंपनियां किस्तों में (Staggered Approach) दाम बढ़ा रही हैं.
- अमेरिकी प्रतिबंध और रूसी तेल की घटती रियायत
पिछले कुछ समय से भारत को रूस से रियायती दरों (Discounted Rates) पर भारी मात्रा में कच्चा तेल मिल रहा था, जिससे वैश्विक संकट के वावजूद भारत में कीमतें काबू में थीं. लेकिन हाल ही में रूसी तेल पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों की छूट की अवधि समाप्त हो गई है. इसके कारण अब भारत के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदना पहले जैसा आसान नहीं रहा. विकल्प के तौर पर गैर-खाड़ी देशों से तेल खरीदने के लिए भारतीय रिफाइनरियों को बहुत मोटी रकम चुकानी पड़ रही है.
- डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया
एक यह भी कारण हो सकत है की कच्चा तेल हमेशा अमेरिकी डॉलर में खरीदा जाता है. वैश्विक उथल-पुथल के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपया लगातार कमजोर हुआ है. रुपया कमजोर होने का मतलब है कि डॉलर खरीदने के लिए अब हमें ज्यादा भारतीय पैसे देने पड़ रहे हैं. इस वजह से कच्चे तेल की मूल कीमत के अलावा उसका 'इंपोर्ट बिल' भी भारी भरकम हो गया है, जिसका अंतिम बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है.
अब क्या आगे और बढ़ेंगे दाम?
आर्थिक जानकारों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ और स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज़ को व्यापार के लिए पूरी तरह नहीं खोला गया, तो आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों में एक या दो और बढ़ोतरी (Fifth Hike) देखने को मिल सकती है. जब तक ब्रेंट क्रूड अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय के लिए स्थिर नहीं होता, तब तक राहत की उम्मीद कम है.