टीएनपी डेस्क (TNP DESK): साल 2025 अब अपनी समाप्ति की ओर है, ऐसे में साल भर के दौरान हुई वारदातों को लोग याद कर रहे हैं. पर अगर साल 2025 की बात करें तो अच्छी यादों के साथ-साथ कुछ ऐसी वारदातें भी इस साल घटित हुई हैं जिन्होंने लोगों के दिलों दिमाग पर गहरा असर डाला है.
साल 2025 के अंतिम चंद दिनों में कुछ ऐसे घटनाओं के बारे में बात करेंगे जिन्होंने कई शब्दों और घटनाओं के मायने बदल दिए हैं. रिश्तों को शर्मसार किया गया, यहाँ तक की लोगों की जान तक को नहीं बक्सा गया है. ऐसे में मुस्कान, सोनम रघुवंशी, गुंजा, हनीमून और नीला ड्रम जैसे शब्द अब सिर्फ नाम नहीं रहे, बल्कि समाज में स्त्री, अपराध, कानून और रिश्तों पर नई बहस की वजह बन गए. यही कारण है कि 2025 को कई लोग “मर्द के दर्द” का साल भी कहने लगे हैं.
इस पूरी कहानी की शुरुआत दिसंबर 2024 से जुड़ी है. 9 दिसंबर 2024 को आईटी इंजीनियर अतुल सुभाष ने आत्महत्या से पहले 24 पन्नों का सुसाइड नोट और करीब डेढ़ घंटे का वीडियो जारी किया. इसमें उन्होंने झूठे मुकदमों, न्याय व्यवस्था और ससुराल पक्ष पर गंभीर सवाल उठाए. उनका दर्द सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों तक गूंजता रहा. उनका लिखा वाक्य “This ATM has been closed permanently” कई पुरुषों की पीड़ा की आवाज बन गया.
इसके बाद 2025 में ऐसी घटनाएं लगातार सामने आने लगीं. फरवरी में टीसीएस कर्मचारी मानव शर्मा ने भी आत्महत्या से पहले वीडियो बनाकर पत्नी और उसके परिवार पर आरोप लगाए. इसके बाद मार्च में मेरठ का चर्चित “नीला ड्रम केस” सामने आया, जिसमें मुस्कान ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी. यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया.
कुछ ही दिनों बाद औरैया जिले से प्रगति यादव का मामला सामने आया, जिसमें शादी के कुछ दिनों बाद ही पति की हत्या की साजिश रची गई. इन घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी कि कई मामलों में पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं.
वहीं इन वारदातों के तार झारखंड से भी जुड़े, जब नवविवाहित गुंजा देवी ने कथित तौर पर अपने फूफा जीवन सिंह (55) के साथ (जिनके साथ वह रिश्ते में थी) उनके साथ रहने के लिए अपने पति प्रियांशु की हत्या करवा दी.
इसी बीच 2025 में सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में पुरुष अपनी आपबीती खुलकर बताने लगे. #MenLivesMatter और #MenToo जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे. पुरुषों के लिए चलने वाली हेल्पलाइनों पर कॉल्स बढ़ गईं. वहीं, महिलाओं के हित में बने कानूनों पर सवाल उठने लगे.
अब भले ही बीते साल मर्दों के साथ हुए कई आपराधिक मामले सामने आए पर इसका दूसरा पहलू भी है. साथ ही इन वारदातों से सभी महिलाओं पर सवाल उठान सही नहीं है. इसी कड़ी में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध आज भी बड़ी संख्या में होते आ रहे हैं. घरेलू हिंसा, दहेज और यौन अपराध जैसे मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कहीं-न-कहीं बहस का संतुलन बिगड़ गया और एक जेंडर को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया.
फिर भी 2025 में खासकर पुरुषों के साथ घटित वारदातों ने देश के लोगों के ज़हन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इन सब के बीच यह चीज़ भी सामने आई की पुरुषों की मानसिक सेहत, झूठे मामलों और कानूनी सुधारों पर खुलकर बात होनी चाहिए. अदालतों ने भी कुछ मामलों में सख्त टिप्पणियां कीं, जिससे यह साफ हो गया कि कानूनों में सुधार जरूरी है, लेकिन किसी एक वर्ग को दोषी ठहराकर समाधान नहीं निकलेगा.
ऐसे में जाते साल के साथ जरूरी है की जेंडर न्यूट्रल कानूनों को इम्प्लीमेंट किया जाए. साथ ही झूठे मामलों पर सख्त सजा और समाज में सोच बदलने की भी जरूरत है. अतुल जैसे मामलों को रोकने के लिए पुरुष और महिला दोनों की बात सुनना जरूरी है. 2025 ने बहस शुरू की है और अब उम्मीद है कि 2026 बदलाव लेकर आएगा.
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