टीएनपी डेस्क (TNP DESK): ममता बनर्जी "स्ट्रीट फाइटर" से बंगाल के सत्ता तक पहुंचीं. पश्चिम बंगाल की राजनीति में सड़क पर संघर्ष से सत्ता बदलने की परंपरा रही है. आजादी के बाद कांग्रेस से लेकर 1977 में बाम मोर्चा और फिर 2011 में तृणमूल तक का सफर इसी रास्ते से हुआ. इस दौर में ममता बनर्जी एक ऐसी नेता के रूप में उभरी, जिन्होंने खुद सड़क पर उतरकर लड़ाई लड़ी और विरोधियों को पराजित किया. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह से उलट गई है. भारतीय जनता पार्टी अब बंगाल में सरकार बनाने जा रही है. यह कई सालों बाद ऐसा होगा, जब दिल्ली और बंगाल में एक ही पार्टी की सरकार होगी.
ममता बनर्जी का अंदाज आक्रामक होता है
71 साल की ममता बनर्जी अभी भी आक्रामक अंदाज में काम करती हैं. चुनाव प्रचार के दौरान यह देखा भी गया. दो महीना के भीतर उन्होंने 90 रैलियां और 22 रोड शो किये. इस चुनाव में सबसे बड़ा विवाद एसआईआर का रहा. इस अभियान के तहत करीब 91 लाख नाम हटाए गए. इनमें से 63 लाख मृत्यु या अनुपस्थित और 27 लाख ऐसे लोग थे, जिन्हें तार्किक विसंगतियों के आधार पर अयोग्य बताया गया. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव आयोग के जरिए उनके समर्थकों के नाम हटाए. ममता बनर्जी का उभार 2000 के दशक में शुरू हुआ. जब उन्होंने बामदल के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, हालांकि असली मोड नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलन से आया. जहां जमीन अधिग्रहण के खिलाफ उनकी लड़ाई में बाम मोर्चा के खिलाफ आक्रोश को हवा दी.
ममता बनर्जी ने 34 साल पुरानी बाम सरकार को बेदखल किया था
2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल पुरानी बाम सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था. सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की, लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार के आरोप भी लगने लगे. वैसे, 2014 के बाद भाजपा ने बंगाल में तेजी से विस्तार शुरू किया. ममता सरकार पर तुष्टीकरण के आरोप लगे. इसके बाद बंगाल में ध्रुवीकरण बढ़ता गया. ममता बनर्जी ने भी इसके कई उपाय किये. दुर्गा पूजा समितियां को आर्थिक सहायता दी, जो 2025 तक बढ़कर 1.10 लाख रुपए प्रति समिति हो गई थी. जगन्नाथ मंदिर और महाकाल मंदिर प्रोजेक्ट शुरू कर धार्मिक संतुलन साधने की कोशिश की, लेकिन इसका बहुत फायदा उन्हें नहीं मिला. ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन 2026 का चुनाव उनके लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ. राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि 2011 में बाम मोर्चा के खिलाफ जो एंटी इनकंबेंसी थी, वहीं अब तृणमूल के खिलाफ 2026 में दिखी है.