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दुनिया की भाषाएं अलग-अलग दिशा में क्यों लिखी जाती हैं? जानिए हिंदी, उर्दू और चीनी की लेखन शैली का रहस्य

Rashmi Prasad  CE
Rashmi Prasad CE
Copy Editor

टीनपी डेस्क (TNP DESK): दुनिया में हजारों भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सभी भाषाएं एक ही दिशा में क्यों नहीं लिखी जातीं? हिंदी और अंग्रेजी बाएं से दाएं (Left to Right) लिखी जाती हैं, जबकि उर्दू और अरबी दाएं से बाएं (Right to Left) लिखी जाती हैं. वहीं पारंपरिक चीनी, जापानी और कोरियाई लेखन में ऊपर से नीचे (Top to Bottom) लिखने की परंपरा भी रही है. यह अंतर किसी नियम या संयोग का नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के इतिहास, लेखन सामग्री और सांस्कृतिक विकास का परिणाम है. आइए जानते हैं कि अलग-अलग भाषाओं की लेखन दिशा के पीछे क्या वजह है.

लेखन की दिशा कैसे तय हुई?

भाषा विशेषज्ञों के अनुसार, प्राचीन समय में लोग पत्थर, मिट्टी की तख्तियों, ताड़ के पत्तों, बांस की पट्टियों और जानवरों की खाल पर लिखा करते थे. उस समय जिस सामग्री पर लिखा जाता था और जिस तरह के औजार इस्तेमाल होते थे, उसी के अनुसार लेखन की दिशा विकसित हुई. समय के साथ यही तरीका परंपरा बन गया और पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा. इसलिए आज भी अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग लेखन दिशा देखने को मिलती है.

हिंदी और अंग्रेजी बाएं से दाएं क्यों लिखी जाती हैं?

हिंदी की लिपि देवनागरी है, जबकि अंग्रेजी रोमन लिपि में लिखी जाती है. दोनों लिपियां बाएं से दाएं लिखी जाती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश लोग दाएं हाथ से लिखते हैं. ऐसे में बाएं से दाएं लिखने पर हाथ पहले से लिखे हुए शब्दों को ढंकता नहीं है और स्याही फैलने की संभावना भी कम रहती है. देवनागरी लिपि में अक्षरों के ऊपर बनने वाली शिरोरेखा भी इस दिशा में लिखने को अधिक सहज बनाती है.

उर्दू और अरबी दाएं से बाएं क्यों लिखी जाती हैं?

उर्दू की जड़ें अरबी और फारसी लिपि से जुड़ी हैं. इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन समय में नुकीली कलम और स्याही से लिखते समय दाएं से बाएं लिखना अधिक सुविधाजनक माना जाता था. इससे लिखने वाले का हाथ ताजी स्याही पर नहीं चलता था और अक्षर साफ बनते थे. यही परंपरा बाद में उर्दू, फारसी और अरबी भाषाओं में स्थायी हो गई. आज भी इन भाषाओं में पूरी लेखन प्रणाली दाएं से बाएं ही अपनाई जाती है.

चीनी भाषा ऊपर से नीचे क्यों लिखी जाती थी?

पारंपरिक चीनी लेखन में अक्षर बांस की लंबी पट्टियों पर लिखे जाते थे, जिन्हें ऊपर से नीचे क्रम में बांधा जाता था. यही कारण था कि चीनी भाषा की पारंपरिक लेखन शैली ऊपर से नीचे विकसित हुई. बाद में जापान और कोरिया ने भी इसी शैली को अपनाया. हालांकि आधुनिक समय में कंप्यूटर, मोबाइल और प्रिंटिंग के बढ़ते उपयोग के कारण चीन, जापान और कोरिया में अब बड़ी संख्या में किताबें और अखबार बाएं से दाएं भी प्रकाशित किए जाते हैं, लेकिन पारंपरिक शैली आज भी सांस्कृतिक महत्व रखती है.

क्या लेखन की दिशा का दिमाग पर असर पड़ता है?

शोध बताते हैं कि लेखन की दिशा पढ़ने और जानकारी को समझने के तरीके को कुछ हद तक प्रभावित कर सकती है. उदाहरण के लिए, जो लोग बाएं से दाएं पढ़ते हैं, वे अक्सर चित्रों और समय-रेखा को भी उसी दिशा में समझते हैं. वहीं दाएं से बाएं पढ़ने वाले लोगों की सोच और दृश्य समझने का पैटर्न थोड़ा अलग हो सकता है. हालांकि इसका बुद्धिमत्ता या सीखने की क्षमता से कोई संबंध नहीं है. यह केवल मस्तिष्क की आदत और अभ्यास का परिणाम होता है.

क्या भविष्य में सभी भाषाएं एक ही दिशा में लिखी जाएंगी?

भाषाविदों का मानना है कि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है. डिजिटल युग में भले ही तकनीक ने सभी प्रकार की लिपियों को आसान बना दिया हो, लेकिन भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति और पहचान का हिस्सा भी होती है. इसलिए हर भाषा अपनी पारंपरिक लेखन शैली को संजोए रखना चाहती है. यही विविधता दुनिया की भाषाओं को और भी खास बनाती है. लेखन की दिशा केवल लिखने का तरीका नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की कहानी भी बताती है. यही कारण है कि हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, चीनी और दुनिया की अन्य भाषाएं आज भी अपनी-अपनी विशिष्ट लेखन परंपरा को बनाए हुए हैं.