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हॉकी कैसे बनी भारत की पहचान? जानिए क्यों इसे कहा जाने लगा देश का राष्ट्रीय खेल

Saumya Shukla
Saumya Shukla
Senior News Publisher • TheNewsPost.in

टिएनपी डेस्क(TNP DESK): भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता आज किसी से छिपी नहीं है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब हॉकी देश की सबसे बड़ी खेल पहचान हुआ करती थी. मैदान पर भारतीय खिलाड़ियों की स्टिक का जादू ऐसा चलता था कि दुनिया की बड़ी-बड़ी टीमें भी उनके सामने टिक नहीं पाती थीं. ओलंपिक में लगातार शानदार प्रदर्शन ने हॉकी को भारत के खेल इतिहास में खास जगह दिलाई. इसी वजह से लोगों के बीच यह धारणा बन गई कि हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है. हालांकि आधिकारिक तौर पर भारत सरकार ने किसी भी खेल को राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं किया है.

भारत में हॉकी का सफर कब शुरू हुआ?

भारत में आधुनिक हॉकी के संगठित रूप की शुरुआत ब्रिटिश दौर में हुई. ब्रिटिश सेना और अधिकारियों के माध्यम से हॉकी भारत पहुंची और धीरे-धीरे भारतीय युवाओं के बीच लोकप्रिय होने लगी.

शुरुआत में यह खेल सेना और कुछ शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित था, लेकिन जल्द ही अलग-अलग शहरों और क्लबों में हॉकी प्रतियोगिताएं होने लगीं. भारत में हॉकी के विकास में बॉम्बे, कलकत्ता, पंजाब और अन्य क्षेत्रों के क्लबों की बड़ी भूमिका रही.

ओलंपिक में भारत का दबदबा कैसे बना?

हॉकी को भारत की पहचान बनाने में सबसे बड़ी भूमिका ओलंपिक खेलों की रही. भारत ने 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में हॉकी में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता.

इसके बाद भारतीय हॉकी टीम ने लगातार कई ओलंपिक खेलों में शानदार प्रदर्शन किया. 1928 से 1956 तक भारत ने लगातार छह ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते. इस दौर में भारतीय टीम का दुनिया में जबरदस्त दबदबा था.

भारतीय खिलाड़ियों की तेज पासिंग, गेंद पर शानदार नियंत्रण और आक्रमण करने की शैली ने हॉकी की दुनिया में भारत की अलग पहचान बना दी.

ध्यानचंद ने दुनिया को दिखाया भारतीय हॉकी का जादू

भारतीय हॉकी के इतिहास की बात हो और मेजर ध्यानचंद का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. उन्हें भारत के महानतम हॉकी खिलाड़ियों में गिना जाता है.

ध्यानचंद की ड्रिब्लिंग और गेंद पर नियंत्रण को लेकर उस समय दुनिया भर में चर्चा होती थी. उन्होंने 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके नेतृत्व में भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन किया. ध्यानचंद के खेल ने भारत में हॉकी की लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी.

आजादी के बाद भी जारी रहा हॉकी का सुनहरा दौर

1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन हॉकी का शानदार प्रदर्शन जारी रहा. 1948 के लंदन ओलंपिक में भारत ने स्वतंत्र देश के रूप में पहला हॉकी स्वर्ण पदक जीता.

इसके बाद 1952 के हेलसिंकी और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भी भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया.

इस तरह भारत ने लगातार छह ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया. यही वह दौर था जब हॉकी भारतीय खेल संस्कृति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई.

हॉकी को राष्ट्रीय खेल क्यों कहा जाने लगा?

भारत में हॉकी को राष्ट्रीय खेल कहे जाने की सबसे बड़ी वजह उसका ऐतिहासिक प्रदर्शन है. लंबे समय तक हॉकी भारत का सबसे सफल ओलंपिक खेल रहा.

स्कूलों और कॉलेजों में हॉकी खेली जाती थी. देश के अलग-अलग हिस्सों में हॉकी प्रतियोगिताएं होती थीं. भारतीय टीम की अंतरराष्ट्रीय सफलता ने इसे आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया.

इसी वजह से धीरे-धीरे लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होती गई कि हॉकी भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय खेल है.

लेकिन क्या हॉकी सच में भारत का राष्ट्रीय खेल है?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. भारत सरकार ने हॉकी को आधिकारिक राष्ट्रीय खेल का दर्जा नहीं दिया है.

कई बार यह सवाल संसद और सरकारी स्तर पर भी उठ चुका है कि किसी खेल को राष्ट्रीय खेल घोषित किया जाए या नहीं. सरकार का रुख रहा है कि किसी एक खेल को राष्ट्रीय खेल घोषित करने के बजाय देश में सभी खेलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

इसलिए हॉकी को आम बोलचाल में भारत का राष्ट्रीय खेल कहा जाता है, लेकिन कानूनी या आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई दर्जा नहीं है.

हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं, इतिहास की पहचान है

भारत में हॉकी की कहानी सिर्फ पदकों की कहानी नहीं है. यह उस दौर की याद दिलाती है जब भारतीय खिलाड़ी दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन कर रहे थे.

ध्यानचंद से लेकर आधुनिक दौर के खिलाड़ियों तक, कई भारतीय हॉकी सितारों ने इस खेल को नई पहचान दी है.

आज क्रिकेट भले ही भारत का सबसे लोकप्रिय खेल हो, लेकिन हॉकी का ऐतिहासिक महत्व अपनी जगह कायम है. यही वजह है कि इसे अक्सर भारत की खेल पहचान और देश का राष्ट्रीय खेल कहा जाता है.

हालांकि आधिकारिक रूप से भारत का कोई राष्ट्रीय खेल नहीं है, लेकिन भारतीय खेल इतिहास में हॉकी का स्थान बेहद खास है. ओलंपिक में लगातार छह स्वर्ण पदक और दशकों तक दुनिया पर दबदबा इस बात का प्रमाण है कि हॉकी ने भारत को सिर्फ पदक नहीं दिए, बल्कि दुनिया के सामने भारतीय खेल प्रतिभा की एक मजबूत पहचान भी बनाई.