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Religion

पितृ पक्ष में बाल-नाखून काटना क्यों माना जाता है वर्जित? जानें क्या है धार्मिक मान्यता

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): पितृ पक्ष आते ही घर-परिवार में पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का सिलसिला शुरू हो जाता है. हिंदू परंपरा में यह समय केवल श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे संयम, सात्विकता और आत्मचिंतन का काल भी बताया गया है. यही वजह है कि इन दिनों खान-पान से लेकर दैनिक जीवन की कई गतिविधियों को लेकर विशेष सावधानी बरतने की परंपरा है. इन्हीं मान्यताओं में एक है पितृ पक्ष के दौरान बाल, दाढ़ी-मूंछ और नाखून न काटना. आखिर इस परंपरा की वजह क्या है और इसके पीछे धार्मिक मान्यता क्या कहती है? आइए जानते हैं.

15 दिनों तक पूर्वजों को समर्पित रहता है समय
पितृ पक्ष को आमतौर पर श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है. यह अवधि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस दौरान लोग अपने पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की स्मृति और उनके प्रति सम्मान को विशेष महत्व दिया जाता है. इसी कारण इस अवधि में व्यक्ति से सादा जीवन जीने, सात्विक भोजन करने और धार्मिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने की अपेक्षा की जाती है.

बाल और नाखून काटने से क्यों करते हैं परहेज?
पितृ पक्ष में बाल और नाखून न काटने की परंपरा मुख्य रूप से धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है. माना जाता है कि श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के प्रति शोक, श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का समय है. ऐसे में शरीर की सजावट या बाहरी रूप में बदलाव करने से बचना इस अवधि की गंभीरता और संयम को दर्शाता है.कई परिवारों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. लोग मानते हैं कि पितृ पक्ष के दौरान बाल, दाढ़ी-मूंछ और नाखून काटना उचित नहीं होता. हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इन नियमों के पालन का तरीका अलग हो सकता है.

शोक और श्रद्धा से जुड़ी मान्यता
पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं में इस दौरान सादगी और संयम को महत्व दिया गया है. बाल और नाखून न काटना भी इसी सादगी का एक हिस्सा माना जाता है. मान्यता यह है कि व्यक्ति इन दिनों बाहरी साज-सज्जा से दूरी बनाकर अपना ध्यान पूजा, तर्पण, श्राद्ध और पूर्वजों के स्मरण पर केंद्रित रखे. इसे पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.

सात्विक जीवन पर दिया जाता है जोर
श्राद्ध पक्ष के दौरान सात्विक जीवनशैली अपनाने की परंपरा है. कई लोग इन दिनों मांसाहार, शराब और अन्य तामसिक चीजों से भी दूरी रखते हैं. इसी तरह बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना भी कुछ परिवारों में टाला जाता है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि बाल और नाखून न काटने की मान्यता मुख्य रूप से धार्मिक और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है. इसे वैज्ञानिक रूप से अनिवार्य नियम नहीं माना जाता. इसलिए अलग-अलग परिवार अपनी परंपरा और धार्मिक विश्वास के अनुसार इसका पालन करते हैं.

पितृ पक्ष में किन कामों से बचते हैं?
पितृ पक्ष के दौरान कई परिवार शुभ और मांगलिक कार्यों से दूरी रखते हैं. आमतौर पर विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते. कुछ लोग इस दौरान नई वस्तुओं की खरीदारी और नए कार्यों की शुरुआत करने से भी बचते हैं. इसी तरह श्राद्ध पक्ष में दिखावे और अनावश्यक खर्च से बचकर पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करने की परंपरा है.

कब काट सकते हैं बाल और नाखून?
जो लोग धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष में बाल और नाखून नहीं काटते, वे आमतौर पर पितृ पक्ष शुरू होने से पहले इन कार्यों को पूरा कर लेते हैं. इसके लिए कई लोग पूर्णिमा के दिन या उससे पहले बाल और नाखून काटने की परंपरा का पालन करते हैं. पितृ पक्ष समाप्त होने के बाद भी अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार बाल, नाखून और दाढ़ी बनवाने का कार्य किया जाता है. हालांकि, इन नियमों को लेकर अलग-अलग समुदायों और परिवारों में परंपराएं भिन्न हो सकती हैं. कुल मिलाकर, पितृ पक्ष में बाल और नाखून न काटने की परंपरा पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, सादगी, संयम और सात्विक जीवन की धार्मिक भावना से जुड़ी हुई है. इसका पालन करना या न करना व्यक्ति की आस्था और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है.