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कल भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ जाएंगे मौसीबाड़ी, जानिए रथ यात्रा में क्या चढ़ता है विशेष भोग

Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor
कल भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ जाएंगे मौसीबाड़ी, जानिए रथ यात्रा में क्या चढ़ता है विशेष भोग

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम है. इस यात्रा का सबसे भावुक और विशेष पहलू यह है कि भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ हर वर्ष अपने मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं. मान्यता है कि इस दौरान तीनों देवताओं का स्वागत ठीक वैसे ही किया जाता है, जैसे किसी घर में मायके या मौसी के घर आए बच्चों का किया जाता है. उन्हें विशेष व्यंजन परोसे जाते हैं, उत्सव मनाए जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना होती है.

रथ यात्रा से पहले निभाई जाती है अनोखी परंपरा

रथ यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज (पूर्व राजपरिवार के प्रतिनिधि) एक विशेष परंपरा निभाते हैं. वे सोने की झाड़ू से भगवान के रथ के मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई करते हैं. इसे 'छेरा पहंरा' कहा जाता है. यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं. इसके बाद वैदिक मंत्रों, शंखध्वनि, ढोल-नगाड़ों और जयघोष के बीच तीनों रथ यात्रा के लिए रवाना होते हैं. सबसे पहले बलभद्र का तालध्वज रथ, फिर देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ निकलता है. हजारों श्रद्धालु मोटी रस्सियों से इन रथों को खींचते हैं. मान्यता है कि रथ खींचने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के पापों का क्षय होता है.

मौसीबाड़ी में भगवान का होता है विशेष स्वागत

रथ यात्रा का समापन गुंडिचा मंदिर में होता है, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है. यहां भगवान, बलभद्र और सुभद्रा सात दिनों तक विराजमान रहते हैं. इस दौरान विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है.

क्या चढ़ता है भगवान को विशेष भोग?

मौसीबाड़ी में भगवान जगन्नाथ को कई पारंपरिक व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है. इनमें सबसे विशेष 'पोडा पीठा' (ओडिशा का पारंपरिक बेक किया हुआ केक) माना जाता है. मान्यता है कि यह भगवान जगन्नाथ का प्रिय व्यंजन है. इसके अलावा खिचड़ी, दाल, विभिन्न प्रकार की सब्जियां, चावल, खीर, मीठे पकवान और अनेक सात्विक व्यंजन भी अर्पित किए जाते हैं. मौसीबाड़ी में भगवान का लाड़-प्यार ठीक उसी तरह किया जाता है, जैसे किसी बच्चे का उसकी मौसी के घर में होता है.

वहीं गुंडिचा मंदिर में सात दिन प्रवास के बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की वापसी यात्रा शुरू होती है, जिसे बाहुड़ा यात्रा कहा जाता है. तीनों रथ फिर से श्रीमंदिर की ओर लौटते हैं. मंदिर पहुंचने के बाद प्रतिमाएं एक दिन तक रथ पर ही विराजमान रहती हैं, ताकि श्रद्धालु दर्शन कर सकें. इसके अगले दिन विधि-विधान के साथ तीनों प्रतिमाओं को मंदिर के गर्भगृह में पुनः स्थापित किया जाता है. आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान का भव्य 'सुनाबेसा' (स्वर्ण अलंकरण) होता है, जिसमें उन्हें स्वर्णाभूषणों से सजाया जाता है. यह रथ यात्रा का सबसे आकर्षक और महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक माना जाता है.

अक्षय तृतीया से शुरू होती है तैयारी

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की तैयारियां अक्षय तृतीया से ही शुरू हो जाती हैं. इसी दिन तीनों देवताओं के लिए अलग-अलग रथों का निर्माण आरंभ होता है. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को प्रतिमाओं का विशेष श्रृंगार कर उन्हें रथों पर विराजमान किया जाता है और फिर भव्य रथ यात्रा शुरू होती है. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई है.