Religion

300 साल से भी पुरानी है रांची के जगन्नाथ मंदिर की आस्था, जानिए क्या है आदिवासी-सदान एकता की अनूठी परंपरा

Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor
300 साल से भी पुरानी है रांची के जगन्नाथ मंदिर की आस्था, जानिए क्या है आदिवासी-सदान एकता की अनूठी परंपरा

रांची (RANCHI): हर साल आषाढ़ महीने में रांची की एक पहाड़ी पर आस्था का ऐसा महासंगम देखने को मिलता है, जहां लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं. लेकिन यह सिर्फ एक रथयात्रा या धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि 335 वर्षों से आदिवासी और सदान समाज की साझा संस्कृति, विश्वास और सामाजिक समरसता की जीवंत पहचान भी है. राजधानी के धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर ने सदियों से लोगों को धर्म, परंपरा और एकता के सूत्र में बांध रखा है.

1691 में नागवंशी शासक ने कराया था निर्माण

जगन्नाथपुर मंदिर का निर्माण 25 दिसंबर 1691 को नागवंशी वंश के शासक ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने कराया था. यह मंदिर बड़कागढ़ क्षेत्र की लगभग 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है. समय के साथ मंदिर का विस्तार हुआ और वर्ष 1991 में इसे वर्तमान भव्य स्वरूप मिला. मंदिर की वास्तुकला ओडिशा के प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी से प्रेरित मानी जाती है. मंदिर परिसर में मुख्य गर्भगृह के अलावा भोग गृह, गरुड़ मंदिर और चौकीदार मंदिर भी मौजूद हैं.

मौसीबाड़ी से जुड़ी है रथयात्रा की परंपरा

मुख्य मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित मौसीबाड़ी रथयात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रथ पर सवार होकर यहां पहुंचते हैं और परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक यहीं विराजमान रहते हैं. इसके बाद भगवान की वापसी यात्रा निकाली जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में घुरती रथ कहा जाता है.

स्वप्न से जुड़ी है मंदिर स्थापना की मान्यता

मंदिर की स्थापना को लेकर एक प्रसिद्ध लोककथा भी प्रचलित है. मान्यता है कि वृद्धावस्था में ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव अपने एक आदिवासी सेवक के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी गए थे. वहां सेवक को स्वप्न में भगवान के दर्शन हुए. बाद में स्वयं ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव को भी स्वप्न में भगवान ने अपनी राजधानी लौटकर मंदिर निर्माण का आदेश दिया. इसे दिव्य संकेत मानते हुए उन्होंने वापस लौटकर वर्ष 1691 में इस मंदिर की स्थापना कराई.

रथयात्रा के साथ ही मंदिर परिसर और आसपास के इलाके में नौ दिनों तक विशाल मेला लगता है. इस दौरान लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं. धार्मिक आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक दुकानें और स्थानीय व्यंजन मेले का प्रमुख आकर्षण होते हैं. भगवान के रथ को खींचने के लिए हजारों श्रद्धालु उत्साह के साथ भाग लेते हैं. पूरे आयोजन के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन और स्वयंसेवकों की विशेष तैनाती की जाती है.

जगन्नाथपुर मंदिर और इसकी रथयात्रा का उल्लेख ब्रिटिश काल के कई इतिहासकारों ने भी किया है. प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम हंटर ने अपनी वर्ष 1877 में प्रकाशित पुस्तक Statistical Account of Bengal में इसे छोटानागपुर क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक आयोजन बताया है. वहीं अन्य इतिहासकारों ने भी मंदिर की भव्यता, ऊंचाई और यहां उमड़ने वाली विशाल भीड़ का विस्तृत वर्णन किया है. ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार धरती आबा बिरसा मुंडा भी अपने धार्मिक प्रवास के दौरान जगन्नाथपुर मंदिर पहुंचे थे. यहां उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ भगवान के दर्शन किए और चंदन का तिलक लगाया. इसके बाद वे आध्यात्मिक साधना के लिए पुरी स्थित जगन्नाथ धाम की यात्रा पर भी गए थे.

वर्ष 1964 में जगन्नाथपुर मंदिर को सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति घोषित किया गया. इसके बाद 1977 में जगन्नाथपुर मंदिर न्यास समिति का गठन किया गया, जो मंदिर के संचालन, विकास, रथयात्रा और अन्य धार्मिक आयोजनों की जिम्मेदारी निभा रही है. हर वर्ष 25 दिसंबर को मंदिर का स्थापना दिवस मनाया जाता है. इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं.