टीएनपी डेस्क (TNP DESK): हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. इस अवसर पर चंद्रदेव की पूजा, मां लक्ष्मी की आराधना, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है. इसी मान्यता के कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है.
मां लक्ष्मी की पूजा से जुड़ी है समृद्धि की मान्यता
शरद पूर्णिमा को धन, सुख और समृद्धि की कामना के लिए मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ माना जाता है. श्रद्धालु घरों और मंदिरों में दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं. कई स्थानों पर रात में जागरण, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी किया जाता है. भगवान विष्णु की पूजा और सत्यनारायण कथा का श्रवण भी इस दिन पुण्यदायी माना जाता है.
चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की परंपरा
शरद पूर्णिमा की प्रमुख परंपराओं में रात के समय खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने का विशेष स्थान है. मान्यता के अनुसार, चंद्रमा की किरणों में रखी खीर को अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करना शुभ होता है. हालांकि, इससे विशेष औषधीय लाभ मिलने के दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए.
चंद्रदेव की पूजा और अर्घ्य का महत्व
इस दिन श्रद्धालु चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें जल अर्पित करते हैं. इसके साथ ही मंत्र-जाप, ध्यान और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ किए गए इन कार्यों से मन को शांति मिलती है.
जानें पूजा का समय और तिथि
पंचांग के अनुसार, 25 अक्टूबर 2026 को शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के बाद पूर्णिमा तिथि आरंभ होने का उल्लेख है. उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 26 अक्टूबर की सुबह तक रह सकती है. ऐसे में आज रात चंद्रमा की पूजा और खीर रखने की परंपरा निभाई जा सकती है. हालांकि, पूजा का सटीक मुहूर्त स्थानीय पंचांग के अनुसार देखना उचित होगा. शरद पूर्णिमा का संदेश श्रद्धा, संयम, सकारात्मकता और जरूरतमंदों की सहायता से जुड़ा है. इस अवसर पर परिवार के साथ पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
