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Nirjala ekadashi 2026: निर्जला एकादशी पर 200 साल बाद बना दुर्लभ हंस राजयोग, जानें इसका महत्व और पूजा-विधि

Priyanka Kumari CE
Sr. Content Writer
Nirjala ekadashi 2026: निर्जला एकादशी पर 200 साल बाद बना दुर्लभ हंस राजयोग, जानें इसका महत्व और पूजा-विधि

टीएनपी डेस्क (TNP DESK):आज 25 जून को देशभर में निर्जला एकादशी का व्रत रखा जा रहा है.आपको बता दें कि वैसे तो साल में आने वाली 24 एकादशियों का अपना-अपना अलग महत्व होता है, लेकिन निर्जला एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना गया है.मान्यता है कि यह एकादशी पूरे वर्ष की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर फल प्रदान करती है.यानी यदि कोई व्यक्ति पूरे साल एक भी एकादशी का व्रत न रख पाए और केवल निर्जला एकादशी का व्रत करे, तो उसे सभी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने और निर्जला व्रत रखने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

भीमसेन ने सबसे पहले किया था निर्जला एकादशी का व्रत

ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ने वाला यह व्रत पापों से मुक्ति, आत्मशुद्धि, मन की शांति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है.पुराणों के अनुसार, महाभारत काल में भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के कहने पर सबसे पहले निर्जला एकादशी का व्रत रखा था. इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है.निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर भगवान विष्णु की आराधना, दान-पुण्य और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. वहीं, वर्ष 2026 की निर्जला एकादशी अपने आप में काफी खास मानी जा रही है, क्योंकि लगभग 200 वर्षों बाद इस दिन रवि योग और हंस महापुरुष राजयोग का शुभ संयोग बन रहा है. इससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है.

आज सत्तू का दान का विशेष महत्व

आज ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:05 बजे से 4:45 बजे तक रहेगा, जबकि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:02 बजे से 12:56 बजे तक रहेगा. वहीं रवि योग सुबह 5:25 बजे से शाम 4:29 बजे तक रहेगा.आपको बता दें कि निर्जला एकादशी के दिन सत्तू का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है.सत्तू शरीर को ठंडक प्रदान करता है, इसलिए जरूरतमंद लोगों को सत्तू का दान करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है.

यह पूजा की सही विधि

आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की पूजा विधि.सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें.इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें.पूजा के लिए एक साफ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.इसके बाद चंदन, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल, पंचामृत, फल आदि अर्पित करें और घी का दीपक जलाकर विधिवत पूजा करें.पूजा के दौरान विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ अथवा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है.निर्जला व्रत के दौरान पूरे दिन भगवान विष्णु का स्मरण करें तथा भजन-कीर्तन और कथा सुनते रहना है.

शाम के समय भी भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए धूप-दीप से आरती करें और भोग अर्पित करें.इस व्रत में सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि पूरे दिन जल का सेवन नहीं किया जाता है.एकादशी के अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद व्रत का पारण करना चाहिए. मान्यता है कि जो व्यक्ति विधि-विधान से पूजा करता है और सभी नियमों का पालन करता है, उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा और पुण्य फल की प्राप्ति होती है.