Religion

कैसे शुरू हुई रक्षाबंधन की परंपरा? सबसे पहले किसने बांधी थी राखी, जानिए पूरी कहानी

Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Sr. Content Writer

टीएनपी डेस्क(TNP DESK):रक्षाबंधन एक ऐसा त्योहार है, जिसका इंतजार भाई-बहन पूरे साल करते हैं. सावन महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है. इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुखी, स्वस्थ और लंबी उम्र की कामना करती है. वहीं भाई भी बहन को उपहार देने के साथ जीवनभर उसकी रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का वचन देता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि राखी बांधने की परंपरा आखिर कब शुरू हुई और सबसे पहले किसने राखी बांधी थी.

 सबसे पहले किसने बांधी थी राखी, जानिए पूरी कहानी

हालांकि इसका कोई एक निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, हालांकि प्राचीन धार्मिक परंपराओं में रक्षा-सूत्र बांधने का उल्लेख जरूर मिलता है.रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कहानी शामिल है. लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण की उंगली में चोट लग गई और उससे खून निकलने लगा. यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया. द्रौपदी के इस स्नेह से कृष्ण भावुक हुए और उन्होंने उनकी रक्षा करने का वचन दिया. Ok महाभारत की कथा में जब भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया गया, तब भगवान कृष्ण ने उनकी लाज बचाई. इसी वजह से लोक परंपरा में कृष्ण और द्रौपदी के रिश्ते को भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के भाव से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, इस कथा को आधुनिक रक्षाबंधन की शुरुआत का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता.

राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी यह कहानी भी है प्रचलित

रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा राजा बलि और माता लक्ष्मी की है. मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके राज्य में रहने लगे थे. भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लाने के लिए माता लक्ष्मी राजा बलि के पास पहुंचीं. कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना. राजा बलि ने भी माता लक्ष्मी को बहन के रूप में स्वीकार किया और भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ जाने की अनुमति दी. यह कथा भी रक्षा-सूत्र और भाई-बहन के रिश्ते से जुड़े भाव को दर्शाती है, लेकिन इसे भी रक्षाबंधन की ऐतिहासिक शुरुआत का प्रमाण नहीं माना जाता.

रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने का त्योहार नहीं हैं

 रक्षाबंधन केवल एक धागा बांधने का त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास, सम्मान और जीवनभर साथ निभाने का प्रतीक है. कई परिवारों में बहनें भाई के साथ भाभी को भी राखी बांधती हैं और उन्हें अपने स्नेह का हिस्सा मानती हैं. हालांकि, यह मूल रक्षाबंधन परंपरा का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक संबंधों के साथ जुड़ी आधुनिक परंपरा है. यही कारण है कि रक्षाबंधन की धार्मिक कथाएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन सभी में प्रेम, अपनापन और रक्षा का भाव प्रमुख है. सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे देश में बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है.