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गणेश चतुर्थी विशेष: कहां है गणपति का वो सिर, जिसे शिव ने क्रोध में काटा था? जानिए रहस्य से जुड़ी इस गुफा के बारे में

Rashmi Prasad
Rashmi Prasad
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टीएनपी डेस्क (TNP DESK): गणेश चतुर्थी का पर्व आते ही देशभर में गणपति बप्पा के स्वागत की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. इस साल 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है. जगह-जगह पंडाल सज चुके हैं और गणेश मंदिरों को भी आकर्षक तरीके से सजाया गया है. भगवान गणेश से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं, जिन्हें बचपन से ही हम सुनते आए हैं. इनमें सबसे चर्चित कथा उनके गजमुख स्वरूप की है. मान्यता है कि भगवान शिव ने क्रोध में बालक गणेश का सिर काट दिया था और बाद में उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाया गया. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान गणेश का वह मूल सिर, जो उनके जन्म के समय था, आखिर कहां गया? पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध उत्तराखंड की एक रहस्यमयी गुफा से है.

पाताल भुवनेश्वर से जुड़ी है खास मान्यता

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा मंदिर धार्मिक आस्था और रहस्यों के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काटने के बाद उसे इसी गुफा में रखा था. यहां गणेश जी को आदि गणेश के नाम से पूजा जाता है. हालांकि यह धार्मिक मान्यता है, जिसका ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित होना अलग विषय है. गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक शिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है.

गुफा में मौजूद है गणेश जी का शिला रूप

पौराणिक मान्यता के अनुसार, पाताल भुवनेश्वर गुफा में गणेश जी का कटा हुआ सिर शिला रूप में मौजूद है. इसके ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शिवाष्टक दल और ब्रह्म कमल के आकार की प्राकृतिक चट्टान दिखाई देती है. कहा जाता है कि इस चट्टान से पानी की बूंदें लगातार गणेश जी के शिला रूपी मस्तक पर गिरती रहती हैं. धार्मिक मान्यता में इसे भगवान शिव द्वारा स्थापित ब्रह्म कमल से जुड़ा बताया जाता है. यही वजह है कि इस गुफा को गणेश भक्तों के लिए बेहद खास माना जाता है.

त्रेता युग से जुड़ी बताई जाती है गुफा की कहानी

पाताल भुवनेश्वर गुफा को लेकर कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं. मान्यता के मुताबिक, त्रेता युग में राजा ऋतुपर्णा ने पहली बार इस दिव्य गुफा की खोज की थी. इसके बाद समय के साथ यह गुफा लोगों की स्मृति से दूर हो गई. धार्मिक कथाओं में कहा जाता है कि द्वापर युग में पांडवों ने दोबारा इस गुफा की खोज की और यहां भगवान शिव की आराधना की. कलियुग में इस गुफा की खोज आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं शताब्दी में किए जाने की मान्यता है.

शेषनाग से जुड़ी है गुफा की बनावट

पाताल भुवनेश्वर गुफा की प्राकृतिक संरचना भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. मान्यता है कि इसकी बनावट ऐसी है, मानो शेषनाग ने चारों ओर से इसकी रक्षा कर रखी हो. गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक आकृतियों को अलग-अलग देवी-देवताओं और पौराणिक प्रसंगों से जोड़ा जाता है. यही धार्मिक मान्यताएं और गुफा की रहस्यमयी संरचना इसे उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं. गणेश चतुर्थी के मौके पर भगवान गणेश के जन्म और उनके गजमुख स्वरूप की कथा के साथ पाताल भुवनेश्वर से जुड़ी यह मान्यता भी भक्तों के बीच खास चर्चा का विषय बन जाती है.