Religion

माथे पर चंद्रमा, गले में सर्प और मुंडमाला... आखिर भोलेनाथ का श्रृंगार इतना अनोखा क्यों? पढ़िए पौराणिक कथा

Priyanka Kumari CE
Sr. Content Writer
माथे पर चंद्रमा, गले में सर्प और मुंडमाला... आखिर भोलेनाथ का श्रृंगार इतना अनोखा क्यों? पढ़िए पौराणिक कथा

टीएनपी डेस्क(TNP DESK):हमारे सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वर्णन है, जिनके अलग-अलग स्वरूप है. वैसे तो सभी भगवान एक ही होते हैं, लेकिन उनके स्वरूप अलग-अलग होते है.आपने देवी-देवताओं को अक्सर सोने-चांदी के गहनों से सजा हुआ देखा होगा, लेकिन इन सब में बाबा भोलेनाथ का स्वरूप कुछ अलग ही दिखाई देता है. जहां सोने-चांदी के गहनों की जगह उनके गले में सर्पों की माला और मुंडमाला होती है, माथे पर चंद्रमा विराजमान होता है और उनकी जटाओं से गंगा माता निकलती हुई दिखाई देती है. वैसे तो सदियों से लोगों ने बाबा भोलेनाथ को इसी स्वरूप में देखा है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर बाबा भोलेनाथ के इस अद्भुत श्रृंगार के पीछे की वजह क्या है.

 आखिर भोलेनाथ का श्रृंगार इतना अनोखा क्यों

यदि आप भी उन लोगों में शामिल है, जिन्हें भगवान शंकर के इस अनोखे श्रृंगार के पीछे की पौराणिक कथा नहीं पता है, तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों भोलेनाथ सोने-चांदी के गहनों की जगह गले में सर्पों की माला पहनते है, माथे पर मुकुट की जगह चंद्रमा धारण किए हुए हैं और उनकी जटाओं से गंगा माता क्यों बहती है. साथ ही, बाबा भोलेनाथ को भांग, धतूरा और बेलपत्र क्यों पसंद है.इन सभी सवालों का जवाब आज हम आपको देने वाले है.

पढ़िए इसके पीछे की क्या है वजह

दरअसल, बाबा भोलेनाथ के इस अद्भुत श्रृंगार के पीछे की काफी लंबी कहानी है.बताया जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ, तो उसमें से कई कीमती रत्न और दिव्य तत्व निकले, जिन्हें सभी ने आपस में बांट लिया. वहीं, समुद्र मंथन से हलाहल विष और अमृत भी निकला.अमृत को पाने के लिए देवी-देवताओं और असुरों के बीच जमकर महायुद्ध हुआ, क्योंकि सभी अमर होना चाहते थे. लेकिन उसी मंथन से निकले हलाहल विष को कोई भी धारण करना नहीं चाहता था. समुद्र मंथन से निकला यह हलाहल विष इतना खतरनाक था कि उसकी एक बूंद भी यदि धरती पर गिर जाती, तो पूरी पृथ्वी नष्ट हो सकती थी.यह विष इतना भयावह था कि उसके आसपास खड़े लोगों का भी पसीना छूट जाता था. सभी देवी-देवताओं और असुरों में से कोई भी उसे धारण करने के लिए आगे नहीं आया, लेकिन विश्व के उद्धार के लिए भगवान भोलेनाथ आगे आए और हलाहल विष को धारण करने की बात स्वीकार कर ली.

इस वजह से नीलकंठ बने भोलेनाथ 

इस विष को लेकर यह कहा गया था कि यदि यह शरीर में फैल गया, तो किसी का भी बचना मुश्किल होगा. यही कारण था कि भगवान शंकर ने इसे अपने कंठ में धारण किया.इसका ताप इतना भयावह था कि भगवान भोलेनाथ का कंठ नीला पड़ गया. यही वजह है कि उन्हें नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है. हलाहल विष का प्रभाव बढ़ने पर जब भगवान भोलेनाथ छटपटाने लगे, तब उनके गले में सर्पों की माला पहनाई गई. माना जाता है कि सर्पों की प्रकृति ठंडी होती है, इसलिए उनके गले को ठंडक मिल सके. वहीं, उनके मस्तिष्क को शांत रखने के लिए चंद्रमा को धारण कराया गया, ताकि उनका मस्तिष्क शांत रहे. सभी देवी-देवताओं ने मिलकर सावन का पूरा महीना भगवान शिव पर जलाभिषेक करने के लिए निर्धारित किया, ताकि उन्हें हलाहल विष के प्रभाव से ठंडक मिल सके.इसके साथ ही यह भी कहा जाता है कि भांग, धतूरा और बेलपत्र की प्रकृति भी शीतल होती है, इसलिए इन्हें भगवान भोलेनाथ को अर्पित किया जाता है.