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शादी के बाद ही क्यों पहनाई जाती है बिछिया? जानिए इसके पीछे क्या है रहस्य और वैज्ञानिक तर्क

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): सनातन धर्म में शादी के बाद महिलाओं के श्रृंगार में कई ऐसे आभूषण शामिल होते हैं, जो सिर्फ सुंदरता ही नहीं बल्कि परंपरा, स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन से भी जुड़े माने जाते हैं. इन्हीं में से एक है पैरों में पहनी जाने वाली चांदी की बिछिया. आपने अक्सर देखा होगा कि विवाहित महिलाएं शादी के बाद बिछिया जरूर पहनती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसकी परंपरा आखिर क्यों शुरू हुई? क्या यह सिर्फ धार्मिक आस्था है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी छिपा है? आइए जानते हैं बिछिया पहनने से जुड़ी मान्यताओं और विज्ञान की दिलचस्प बातें.

बिछिया पहनने के पीछे क्या है वैज्ञानिक कारण?

बिछिया पहनने को लेकर आयुर्वेद और पारंपरिक मान्यताओं में कई बातें कही गई हैं. माना जाता है कि महिलाओं के पैरों की दूसरी और तीसरी उंगली से जुड़ी नसों का संबंध प्रजनन तंत्र और गर्भाशय से होता है. इन उंगलियों में चांदी की बिछिया पहनने से उन बिंदुओं पर हल्का दबाव बना रहता है, जिससे रक्त संचार बेहतर रहने में मदद मिलती है. पारंपरिक मान्यता के अनुसार इससे महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य को लाभ मिलता है और मासिक धर्म चक्र को संतुलित रखने में भी सहायता मिल सकती है. हालांकि, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इन दावों की स्पष्ट पुष्टि नहीं की है और इन्हें पारंपरिक मान्यताओं के रूप में ही देखा जाता है. इसके अलावा चांदी को शरीर की अतिरिक्त ऊष्मा को संतुलित करने वाला धातु भी माना जाता है. मान्यता है कि चांदी शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बनाए रखने में सहायक होती है.

धार्मिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है बिछिया?
सनातन धर्म में बिछिया को सोलह श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. विवाह के बाद इसे पहनना सुहाग का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि विवाहित महिला के पैरों में बिछिया होने से उसके दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि और स्थिरता बनी रहती है. यह भी माना जाता है कि पैरों की दूसरी उंगली में बिछिया धारण करने से पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होता है. कई धार्मिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं में इसे मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने वाला आभूषण भी बताया गया है. साथ ही यह नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा का प्रतीक भी माना जाता है. साथ ही धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोना देवताओं का आभूषण माना जाता है. इसलिए शरीर के निचले हिस्से में सोना धारण करना उचित नहीं माना गया. यही कारण है कि पैरों में प्रायः चांदी की बिछिया पहनने की परंपरा चली आ रही है.

रामायण से भी जुड़ी है बिछिया की कथा
बिछिया का उल्लेख रामायण में भी मिलता है. मान्यता है कि जब रावण माता सीता का हरण कर उन्हें लंका ले जा रहा था, तब माता सीता ने अपने कुछ आभूषण रास्ते में गिराए थे. लोककथाओं के अनुसार इनमें उनकी बिछिया भी शामिल थी, ताकि भगवान श्रीराम और लक्ष्मण उनके मार्ग का पता लगा सकें. इसी कारण बिछिया को केवल सुहाग का प्रतीक ही नहीं, बल्कि विश्वास, पहचान और वैवाहिक बंधन का भी प्रतीक माना जाता है.

क्या अविवाहित लड़कियां बिछिया पहन सकती हैं?
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार बिछिया विवाहित महिलाओं का आभूषण माना जाता है. इसलिए सामान्यतः अविवाहित कन्याओं द्वारा इसे पहनने की परंपरा नहीं है. हालांकि, आज के समय में कई लोग इसे फैशन के रूप में भी पहनते हैं. यह व्यक्तिगत पसंद का विषय है, जबकि धार्मिक दृष्टि से इसे विवाह के बाद धारण करना ही शुभ माना जाता है.