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शरीर के निचले भाग में सोने के आभूषण क्यों नहीं पहने जाते? जानिए कमर के ऊपर सोना और नीचे चांदी धारण करने की क्यों है परंपरा

Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor
शरीर के निचले भाग में सोने के आभूषण क्यों नहीं पहने जाते? जानिए कमर के ऊपर सोना और नीचे चांदी धारण करने की क्यों है परंपरा

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भारतीय संस्कृति में आभूषण केवल सुंदरता बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और ऊर्जा संतुलन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं. प्राचीन काल से ही महिलाओं और पुरुषों द्वारा विभिन्न प्रकार के आभूषण धारण करने की परंपरा रही है, हालांकि समय के साथ यह अधिकतर महिलाओं के श्रृंगार से जुड़ गई. आपने अक्सर देखा होगा कि महिलाएं सोने के आभूषण जैसे मांगटीका, झुमके, हार, मंगलसूत्र, बाजूबंद और अंगूठियां कमर के ऊपर वाले हिस्से में पहनती हैं, जबकि पायल, बिछिया और अन्य पैरों के आभूषण अधिकतर चांदी के बने होते हैं. आखिर ऐसा क्यों है? इसके पीछे केवल धार्मिक मान्यताएं ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और पारंपरिक कारण भी बताए गए हैं.

कमर के नीचे सोना पहनना क्यों माना जाता है वर्जित?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोना मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु से जुड़ी पवित्र धातु माना जाता है. मां लक्ष्मी धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए स्वर्ण को उनका प्रतीक माना जाता है. इसी वजह से सोने का सम्मान करना आवश्यक माना गया है. मान्यता है कि यदि सोने के आभूषण पैरों या कमर के नीचे पहने जाएं, तो यह देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु का अनादर माना जाता है. इसी कारण भारतीय परंपरा में महिलाओं को सोने की पायल, बिछिया या पैरों के अन्य आभूषण पहनने से बचने की सलाह दी जाती है. ऐसी भी मान्यता है कि इस नियम की अनदेखी करने से मां लक्ष्मी अप्रसन्न हो सकती हैं, जिससे आर्थिक परेशानियां और घर की सुख-समृद्धि में कमी आ सकती है.

कमर के नीचे चांदी पहनने की परंपरा क्यों है?

भारतीय परंपरा में चांदी को शीतल, सात्विक और सकारात्मक ऊर्जा देने वाली धातु माना गया है. यही कारण है कि पायल, बिछिया, कड़े और अन्य पैरों के आभूषण प्रायः चांदी के बनाए जाते हैं. धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि चांदी नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने में सहायक होती है और घर-परिवार में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में मदद करती है. इसलिए पैरों में चांदी धारण करना शुभ माना जाता है.

धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इसके पीछे कुछ पारंपरिक वैज्ञानिक तर्क भी दिए जाते हैं. माना जाता है कि सोना शरीर में ऊष्मा (गर्मी) बढ़ाने वाला धातु माना जाता है, जबकि चांदी शरीर को शीतलता प्रदान करने वाली धातु मानी जाती है. शरीर के ऊपरी हिस्से में सोने के आभूषण पहनने और निचले हिस्से में चांदी धारण करने से शरीर के तापमान और ऊर्जा के संतुलन को बनाए रखने में सहायता मिलने की पारंपरिक मान्यता है. हालांकि, इन दावों की आधुनिक वैज्ञानिक शोधों से व्यापक पुष्टि नहीं हुई है. आयुर्वेद और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, शरीर में ऊर्जा का प्रवाह विभिन्न दिशाओं में होता है. ऐसी मान्यता है कि सोना सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित और संचित करने में सहायक माना जाता है, जबकि चांदी शरीर से अतिरिक्त या नकारात्मक ऊर्जा के संतुलन में भूमिका निभाती है. इसी कारण कमर के ऊपर सोना और नीचे चांदी पहनने की परंपरा विकसित हुई.

लोकमान्यताओं के अनुसार, पैरों में चांदी की पायल और बिछिया पहनने से शरीर के निचले हिस्से में रक्त संचार बेहतर रहता है और शरीर को शीतलता मिलती है. कुछ पारंपरिक मान्यताएं यह भी कहती हैं कि चांदी महिलाओं के स्वास्थ्य, विशेषकर हार्मोनल संतुलन और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकती है. हालांकि, इन दावों के समर्थन में पर्याप्त आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. आज भी अधिकांश भारतीय परिवारों में कमर के ऊपर सोने और कमर के नीचे चांदी के आभूषण पहनने की परंपरा का पालन किया जाता है. यह परंपरा धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा है. भले ही इसके कुछ वैज्ञानिक दावों पर शोध अभी सीमित हो, लेकिन भारतीय संस्कृति में इसे सम्मान और शुभता का प्रतीक माना जाता है. इसलिए यदि आप भी सोचते हैं कि पैरों में सोने की पायल या बिछिया क्यों नहीं पहनी जाती, तो इसका उत्तर केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है. इसके पीछे संस्कृति, परंपरा, ऊर्जा संतुलन और स्वास्थ्य से जुड़ी कई पारंपरिक धारणाएं भी जुड़ी हुई हैं.