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सुपरमार्ट का सीक्रेट गेम! कैश काउंटर पर ही क्यों रखी जाती हैं चॉकलेट्स, वजह जानकर कहेंगे- 'अरे, ये तो कभी सोचा ही नहीं'

Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor
सुपरमार्ट का सीक्रेट गेम! कैश काउंटर पर ही क्यों रखी जाती हैं चॉकलेट्स, वजह जानकर कहेंगे- 'अरे, ये तो कभी सोचा ही नहीं'

टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि सुपरमार्केट में केवल जरूरी सामान खरीदने जाते हैं, लेकिन बिल बनने तक आपकी ट्रॉली में कुछ ऐसी चीजें भी आ जाती हैं, जिन्हें खरीदने का कोई प्लान ही नहीं था? अगर जवाब 'हां' है, तो यकीन मानिए आप अकेले नहीं हैं. यह आपकी गलती नहीं, बल्कि सुपरमार्केट की बेहद सोची-समझी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है.

अक्सर लोग पूरे स्टोर में घूमकर अपनी जरूरत का सामान चुन लेते हैं और फिर बिलिंग काउंटर की लाइन में खड़े हो जाते हैं. लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है. आपने शायद गौर किया होगा कि बिलिंग काउंटर के आसपास हमेशा चॉकलेट, टॉफी, च्युइंग गम, कैंडी, बैटरी, रेजर, लिप बाम या अन्य छोटी-छोटी चीजें सजी होती हैं. सवाल यह है कि इन्हें स्टोर के किसी और हिस्से में क्यों नहीं रखा जाता? इसका जवाब सीधे तौर पर मानव मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ है.

'इम्पल्स बाइंग' का खेल, जिसमें फंस जाते हैं ज्यादातर ग्राहक

मार्केटिंग एक्सपर्ट इस रणनीति को 'इम्पल्स बाइंग' (Impulse Buying) कहते हैं. इसका मतलब है बिना पहले से योजना बनाए अचानक कोई सामान खरीद लेना. जब आप सुपरमार्केट में खरीदारी करते हैं, तब आपका दिमाग लगातार फैसले ले रहा होता है. कौन-सा ब्रांड लें, कौन-सा ऑफर बेहतर है, किस चीज की कितनी जरूरत है, इन सभी निर्णयों के कारण मानसिक ऊर्जा खर्च होती रहती है. मनोविज्ञान में इसे 'डिसीजन फटीग' (Decision Fatigue) यानी फैसले लेने से होने वाली मानसिक थकान कहा जाता है.

इसी मानसिक थकान का फायदा सुपरमार्केट उठाते हैं. जब ग्राहक बिलिंग लाइन में पहुंचता है, तब वह पहले ही कई फैसले ले चुका होता है. ऐसे समय में सामने रखी 10, 20 या 50 रुपये की आकर्षक चीजें उसे छोटी और सस्ती लगती हैं. ग्राहक सोचता है कि इतने बड़े बिल में कुछ रुपये और जुड़ जाएंगे तो क्या फर्क पड़ेगा. इसी सोच के चलते वह बिना जरूरत भी उन चीजों को खरीद लेता है.

बच्चों को भी बनाया जाता है इस रणनीति का हिस्सा

बिलिंग काउंटर की डिजाइन केवल बड़ों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती. यहां रखी गई चॉकलेट और टॉफियां अक्सर बच्चों की आंखों और हाथों की ऊंचाई पर सजाई जाती हैं. जब माता-पिता बिलिंग और भुगतान में व्यस्त होते हैं, तब बच्चों की नजर इन रंग-बिरंगी चीजों पर पड़ती है. वे तुरंत उन्हें उठाकर खरीदने की जिद करने लगते हैं. उस समय पीछे लंबी लाइन लगी होती है और अधिकांश माता-पिता सार्वजनिक जगह पर बहस करने से बचना चाहते हैं. ऐसे में वे बच्चे की जिद मान लेते हैं और वह सामान भी बिल में जुड़ जाता है.

छोटे-छोटे उत्पाद, लेकिन बड़ा मुनाफा

एक ग्राहक को 10 या 20 रुपये की अतिरिक्त खरीदारी मामूली लग सकती है, लेकिन यही छोटी-छोटी खरीदारी लाखों ग्राहकों से मिलकर सुपरमार्केट के लिए करोड़ों रुपये की अतिरिक्त कमाई का जरिया बन जाती है. रिटेल इंडस्ट्री में इसे 'लास्ट-मिनट सेल' भी कहा जाता है. कई बार इन उत्पादों पर मुनाफा भी अन्य सामानों की तुलना में अधिक होता है. इसलिए इन्हें ऐसी जगह रखा जाता है जहां हर ग्राहक की नजर जरूर पड़े.

कैसे बचें इस मार्केटिंग ट्रिक से?

अगर आप फिजूल खर्च से बचना चाहते हैं, तो कुछ आसान बातों का ध्यान रखें:
•    खरीदारी से पहले जरूरी सामान की सूची बनाकर उसी तक सीमित रहें. 
•    बिलिंग काउंटर पर रखे सामान को सिर्फ देखकर आगे बढ़ जाएं. 
•    बच्चों के साथ खरीदारी करते समय पहले से उन्हें समझा दें कि अतिरिक्त चीजें नहीं खरीदी जाएंगी. 
•    लाइन में खड़े रहते समय मोबाइल या खरीदारी की सूची पर ध्यान दें, ताकि नजर बार-बार डिस्प्ले पर न जाए. 

हर चमकती चीज जरूरी नहीं होती

अगली बार जब आप सुपरमार्केट के बिलिंग काउंटर पर खड़े हों और सामने रखी चॉकलेट या टॉफी खरीदने का मन करे, तो एक पल रुककर सोचिए. हो सकता है यह आपकी जरूरत नहीं, बल्कि एक ऐसी मार्केटिंग रणनीति हो, जिसे आपकी मनोवैज्ञानिक आदतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. यही वजह है कि दुनिया के लगभग हर बड़े सुपरमार्केट में बिलिंग काउंटर के पास ऐसी छोटी-छोटी चीजें जरूर रखी जाती हैं.