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बच्चों में बढ़ रही Juvenile Delinquency की टेन्डन्सी! आखिर क्यों हिंसक हो रहे बच्चे, कहां चूक रहे माता-पिता?

Rashmi Prasad
Rashmi Prasad
Copy Editor

टीनपी डेस्क (TNP DESK): आज के दौर में अपराध की दुनिया सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं रह गई है. कम उम्र के बच्चे भी ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, जिनके बारे में सुनकर हैरानी होती है. हाल के दिनों में हरियाणा के पंचकूला से सामने आए एक मामले में तीसरी कक्षा के बच्चे पर पहली कक्षा की बच्ची के साथ मारपीट का आरोप लगा. वहीं, आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में एक युवक ने दसवीं कक्षा की छात्रा पर चेनसॉ से हमला कर दिया. इसके अलावा, ऐसे कई मामले भी सामने आते हैं, जहां छोटे बच्चे जिद पूरी नहीं होने पर माता-पिता को गाली देते हैं या उनके साथ मारपीट करने लगते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बच्चों में गुस्सा और हिंसक प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है? क्या इसके पीछे परिवार, स्कूल, गलत संगत या सोशल मीडिया की भूमिका है? साथ ही, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के अपराध करने पर कानून क्या कहता है?

क्या है जुवेनाइल डिलिंक्वेंसी?

जुवेनाइल डिलिंक्वेंसी यानी बाल अपराध का मतलब है, जब कोई नाबालिग ऐसा गैरकानूनी काम करता है, जिसे किसी वयस्क द्वारा किए जाने पर अपराध माना जाता. भारत में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 {Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015} के तहत 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है. हालांकि, कानून का उद्देश्य सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि बच्चे को सुधारने, उसकी काउंसलिंग करने और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने पर भी जोर देना है. 16 से 18 साल के बच्चों पर जघन्य अपराध के मामलों में कानून के तहत प्रारंभिक आकलन का विशेष प्रावधान है.

आखिर क्यों अपराध की ओर बढ़ रहे बच्चे?

- घर का हिंसक माहौल: बच्चा सबसे पहले अपने परिवार से व्यवहार करना सीखता है. अगर घर में मारपीट, गाली-गलौज और लगातार झगड़े होते हैं, तो इसका असर उसके मन पर पड़ता है. कई बार बच्चे अपने अंदर का गुस्सा दूसरों पर निकालने लगते हैं.

- माता-पिता की अनदेखी: आज की व्यस्त जिंदगी में कई माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते. ऐसे में बच्चे अपनी भावनाएं और परेशानियां साझा नहीं कर पाते. उन्हें सही-गलत समझाने वाला कोई नहीं होता.

-गलत संगत का प्रभाव: दोस्तों के दबाव में बच्चे कई बार ऐसे काम करने लगते हैं, जिन्हें वे अकेले कभी नहीं करते. ग्रुप में अपनी पहचान बनाने और दूसरों को प्रभावित करने की चाह उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है.

- सोशल मीडिया और हिंसक कंटेंट: इंटरनेट, ऑनलाइन गेम और फिल्मों में दिखने वाली हिंसा का बच्चों पर असर पड़ सकता है. कम उम्र में सही-गलत की समझ विकसित नहीं होने के कारण वे कई बार देखी गई चीजों की नकल करने लगते हैं.

- स्कूल से दूरी और बुलिंग: पढ़ाई में कमजोर प्रदर्शन, स्कूल में अपमान, दूसरे बच्चों द्वारा परेशान किया जाना और अनुशासन की कमी भी बच्चे को अकेला और चिड़चिड़ा बना सकती है.

- नशा और आर्थिक दबाव: नशे के संपर्क, गरीबी और परिवार की आर्थिक परेशानियां भी कुछ बच्चों को अपराध की ओर धकेल सकती हैं.

माता-पिता किन बातों का रखें ध्यान?

बच्चों को अपराध से दूर रखने की शुरुआत घर से ही होती है. माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ रोजाना समय बिताएं और उनकी बातें ध्यान से सुनें. उनके मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर उम्र के हिसाब से नजर रखें. बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक गुस्सा, झूठ बोलना, स्कूल से दूरी बनाना या हिंसक व्यवहार दिखने पर उसे नजरअंदाज न करें. मारपीट या डांटने के बजाय प्यार से बात करें और जरूरत पड़ने पर काउंसलर की मदद लें. याद रखें, बच्चों को सिर्फ अच्छे स्कूल और सुविधाओं की नहीं, बल्कि सही परवरिश, समय, संस्कार और emotional सुरक्षा की भी जरूरत होती है.