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कैसे होता है तूफानों का नामकरण, कौन करता है डिसाइड? जानिए हुदहुद से लेकर अर्नब के नाम के पीछे की कहानी

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): समुद्र में उठने वाला चक्रवाती तूफान जब तटों की ओर बढ़ता है, तो उसकी रफ्तार, दिशा और तबाही की आशंका के साथ उसका नाम भी चर्चा में आ जाता है. कभी तूफान का नाम ‘अम्फान’ , तो कभी ‘यास’ या ‘फानी’ या फिर कभी ‘हुदहुद’. अब चक्रवात ‘अर्नब’ को लेकर भी लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इस तूफान का नाम किसने रखा, इसका मतलब क्या है और तूफानों के नाम तय करने का अधिकार किसके पास होता है. दरअसल, चक्रवातों के नाम रखने के पीछे एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था काम करती है, जिसके तहत पहले से तय सूची के अनुसार तूफानों को नाम दिए जाते हैं.

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, चक्रवात ‘अर्नब’ का नाम बांग्लादेश ने प्रस्तावित किया है. यह नाम उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में आने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए तैयार की गई सूची का हिस्सा है. बंगाली भाषा में ‘अर्नब’ का अर्थ समुद्र या महासागर बताया जाता है. तूफानों को नाम देने का मुख्य उद्देश्य उनकी पहचान आसान बनाना और मौसम संबंधी चेतावनियों को आम लोगों तक स्पष्ट रूप से पहुंचाना है. नाम होने से एक ही समय में चर्चा में रहने वाले अलग-अलग तूफानों को पहचानने और उनके बारे में जानकारी साझा करने में भी आसानी होती है.

कौन तय करता है चक्रवातों के नाम?
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले चक्रवातों के नामकरण की जिम्मेदारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCAP) के अंतर्गत गठित उष्णकटिबंधीय चक्रवात पैनल की व्यवस्था से जुड़ी है. इस क्षेत्र के सदस्य देश अपने-अपने नाम प्रस्तावित करते हैं. इन नामों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सूची में शामिल किया जाता है और जरूरत पड़ने पर क्रमवार इस्तेमाल किया जाता है.

उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में चक्रवातों के नामकरण की व्यवस्था वर्ष 2004 में शुरू हुई थी. शुरुआत में कुछ देशों ने इस प्रक्रिया में भाग लिया, लेकिन समय के साथ सदस्य देशों की संख्या और नामों की सूची का विस्तार हुआ. अप्रैल 2020 में अपनाई गई सूची में 13 देशों के नाम शामिल हैं. इनमें बांग्लादेश, भारत, ईरान, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, श्रीलंका, थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और यमन शामिल हैं.

13 देशों ने दिए 52 नाम
इस सूची में शामिल 13 देशों ने कुल 52 नाम प्रस्तावित किए हैं. हर देश की ओर से दिए गए नामों को तय क्रम में रखा गया है. जब किसी क्षेत्र में नया चक्रवात विकसित होता है और उसे नाम देने की जरूरत पड़ती है, तो सूची में उपलब्ध अगला नाम इस्तेमाल किया जाता है. इस तरह नामकरण किसी व्यक्ति या संस्था की तत्काल पसंद पर नहीं, बल्कि पहले से निर्धारित अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया के आधार पर होता है.

सामान्य तौर पर उत्तरी हिंद महासागर की निर्धारित सूची में प्रत्येक नाम का इस्तेमाल एक बार किया जाता है. इस्तेमाल हो चुके नाम को उसी सूची में दोबारा नहीं दोहराया जाता. इससे चक्रवातों की पहचान और उनके रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखने में मदद मिलती है. हालांकि, अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में नामकरण की प्रणालियां अलग हो सकती हैं. इसलिए दुनिया के सभी चक्रवातों के लिए एक ही सूची लागू नहीं होती.

चक्रवातों का नामकरण केवल पहचान तक सीमित नहीं है. इसका मकसद मौसम विभाग, प्रशासन, मीडिया और आम लोगों के बीच खतरे से जुड़ी जानकारी को सरल और प्रभावी बनाना भी है. हालांकि, किसी तूफान का नाम उसकी तीव्रता या संभावित नुकसान का संकेत नहीं होता. खतरे का आकलन उसकी गति, दबाव, बारिश, हवा और मौसम विभाग की चेतावनियों के आधार पर किया जाता है.