LIFE STYLE

तांबे-पीतल से स्टील और नॉन-स्टिक तक: आखिर कैसे गई बदल हमारी रसोई?

Rashmi Prasad  CE
Rashmi Prasad CE
Copy Editor

टीनपी डेस्क (TNP DESK): एक समय था जब भारतीय घरों की रसोई में तांबे, पीतल और कांसे के बर्तन चमकते नजर आते थे. बड़े-बुजुर्ग इन बर्तनों को सिर्फ खाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि सेहत और परंपरा से भी जोड़कर देखते थे. बर्तनों की सफाई के लिए राख, इमली और नींबू तक का इस्तेमाल होता था. लेकिन समय के साथ रसोई का पूरा स्वरूप बदल गया. तांबे और पीतल की जगह स्टेनलेस स्टील, एल्युमिनियम, कांच और नॉन-स्टिक बर्तनों ने ले ली. सवाल है कि आखिर यह बदलाव क्यों आया और क्या आधुनिक बर्तन पुराने बर्तनों से बेहतर हैं?

पहले तांबे और पीतल के बर्तन क्यों इस्तेमाल होते थे?

पुराने समय में तांबे और पीतल के बर्तन भारतीय रसोई का अहम हिस्सा हुआ करते थे. तांबा गर्मी का अच्छा संवाहक है, इसलिए इसमें खाना जल्दी गर्म हो जाता है. वहीं पीतल के बर्तन भी लंबे समय तक इस्तेमाल किए जाते थे और इन्हें मजबूत तथा टिकाऊ माना जाता था. पूजा-पाठ से लेकर रोजमर्रा के भोजन तक इन धातुओं के बर्तनों का इस्तेमाल आम था. हालांकि, इन बर्तनों में खाना पकाने और रखने के दौरान कुछ सावधानियां भी जरूरी थीं. खासकर अम्लीय यानी खट्टी चीजों को बिना उचित परत वाले तांबे या पीतल के बर्तन में पकाना सुरक्षित नहीं माना जाता. इसलिए पारंपरिक रसोई में इन बर्तनों की देखभाल और सही इस्तेमाल की जानकारी भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी दी जाती थी.

फिर स्टील ने कैसे बनाई जगह?

शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के साथ लोगों को ऐसे बर्तनों की जरूरत महसूस हुई जिन्हें इस्तेमाल करना और साफ करना आसान हो. यहीं से स्टेनलेस स्टील लोकप्रिय हुआ. यह मजबूत होता है, जल्दी खराब नहीं होता और सामान्य परिस्थितियों में इसकी देखभाल भी आसान होती है. स्टील के बर्तनों को रोजाना इस्तेमाल किया जा सकता है और इन्हें साफ करने में भी बहुत ज्यादा मेहनत नहीं लगती. यही वजह है कि धीरे-धीरे भारतीय रसोई में स्टील के बर्तनों की संख्या बढ़ती गई. आज भी अधिकांश घरों में प्लेट, गिलास, कटोरी, कड़ाही और दूसरे बर्तनों के लिए स्टील एक आम विकल्प है.

नॉन-स्टिक बर्तनों की एंट्री क्यों हुई?

जब लोगों की जिंदगी और ज्यादा व्यस्त हुई तो खाना बनाने में समय और मेहनत बचाने की जरूरत बढ़ी. नॉन-स्टिक बर्तनों ने इसी जरूरत को पूरा किया. इनमें खाना अपेक्षाकृत कम तेल में पकाया जा सकता है और सफाई भी आसान होती है. लेकिन नॉन-स्टिक बर्तनों के साथ इस्तेमाल की सही तकनीक जरूरी है. बहुत अधिक तापमान पर इन्हें गर्म करना या कोटिंग खराब होने के बाद लंबे समय तक इस्तेमाल करना उचित नहीं माना जाता. ऐसे बर्तनों में लकड़ी या सिलिकॉन के चम्मच इस्तेमाल करना बेहतर होता है, ताकि सतह पर खरोंच न आए.

 

क्या पुराने बर्तन ज्यादा सेहतमंद थे?

यह कहना सही नहीं होगा कि तांबा-पीतल हमेशा आधुनिक बर्तनों से बेहतर हैं या स्टील-नॉन-स्टिक हमेशा सुरक्षित हैं. असल फर्क बर्तन की गुणवत्ता, उसकी स्थिति और इस्तेमाल के तरीके से पड़ता है. तांबे और पीतल के बर्तनों में खाना पकाते समय उनकी अंदरूनी परत और खाद्य पदार्थ की प्रकृति महत्वपूर्ण होती है. वहीं नॉन-स्टिक बर्तन क्षतिग्रस्त होने पर बदल देना चाहिए. स्टेनलेस स्टील सामान्य खाना पकाने के लिए व्यावहारिक विकल्प माना जाता है.

बदलती रसोई सिर्फ बर्तनों की कहानी नहीं

तांबे और पीतल से स्टील और नॉन-स्टिक तक का सफर सिर्फ फैशन का बदलाव नहीं है. इसके पीछे बदलती जीवनशैली, परिवारों का आकार, कामकाजी लोगों की संख्या, समय की कमी, सफाई की सुविधा और बाजार में उपलब्ध नई तकनीकें भी जिम्मेदार हैं. आज कई घरों में पारंपरिक बर्तन दोबारा लौट रहे हैं. लोग तांबे की बोतल, पीतल के बर्तन और लोहे की कड़ाही जैसी चीजों को फिर से इस्तेमाल करने लगे हैं. यानी आधुनिक रसोई ने पुराने बर्तनों को पूरी तरह भुलाया नहीं है, बल्कि जरूरत के हिसाब से परंपरा और सुविधा दोनों को साथ रखने की कोशिश की जा रही है.