Tnp desk: झारखंड का मांदर अब बजेगा तो पूरा देश सुनेगा. झारखंड की पहचान सिर्फ पहाड़ियों, जंगल और खनिज संपदा से नहीं रहेगी। . इस मिट्टी की अपनी एक आवाज भी है—मांदर की थाप. वही थाप, जिस पर गांवों के आंगन में कदम थिरकते हैं, पर्वों की खुशियां आकार लेती हैं और पीढ़ियों पुरानी लोक परंपराएं आज भी जीवित दिखाई देती हैं. अब इसी सांस्कृतिक आवाज को देश स्तर पर एक आधिकारिक पहचान मिल गई है.
झारखंड के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि,अब क्या होंगें फायदे
झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर ऑफ झारखंड’ को Geographical Indication यानी GI टैग मिल गया है. भारत सरकार के Geographical Indications Registry में इसे पंजीकृत किया गया है. इसका आवेदन संख्या 777 है और आवेदक Raidih Mandar Producer Company Limited है , जो गुमला में स्थित है. आवेदन 24 सितंबर 2021 को दाखिल किया गया था.यानी जिस मांदर की थाप झारखंड के गांवों में वर्षों से गूंजती रही, अब उसी मांदर के साथ झारखंड का नाम आधिकारिक तौर पर जुड़ गया है.
मांदर सिर्फ आदिवासी वाद्य नहीं, झारखंड की साझा सांस्कृतिक धड़कन भी है
मांदर को अक्सर आदिवासी संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी मौजूदगी झारखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में इससे कहीं व्यापक है. अलग-अलग समुदायों के लोकगीत, नृत्य, उत्सव और सामुदायिक आयोजनों में मांदर की थाप सुनाई देती है.झारखंड पर्यटन विभाग भी मांदर को राज्य के पारंपरिक ताल वाद्यों में शामिल करता है और इसे लोकगीत तथा नृत्य परंपराओं के साथ जुड़ा हुआ बताता है. यही वजह है कि मांदर को केवल एक वाद्य यंत्र कहना शायद इसकी पूरी कहानी नहीं बताता. यह झारखंड के गांवों में उत्सव का निमंत्रण, नृत्य की शुरुआत और सामूहिक खुशी की लय भी है.
सरहुल से करमा तक, मांदर के बिना अधूरा लगता है उत्सव
झारखंड के प्रमुख पर्वों और लोक उत्सवों में मांदर की विशेष भूमिका है. सरहुल, करमा, सोहराय, जितिया, फगुआ जैसे पर्वों और अनेक स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों में इसकी थाप वातावरण को उत्सव में बदल देती है. शादी-विवाह और दूसरे सामाजिक आयोजनों में भी मांदर का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है. इसकी ताल पर लोकनृत्य की गोलाकार पंक्तियां बनती हैं और गीतों के साथ पूरा माहौल एक सामूहिक उत्सव में बदल जाता है.
मिट्टी, चमड़ा और कारीगर के हाथों से निकलती है मांदर की आवाज.
मांदर की खासियत सिर्फ इसकी धुन में नहीं, बल्कि इसे बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया में भी छिपी है. पारंपरिक रूप से मांदर का खोल मिट्टी से तैयार किया जाता है. मिट्टी को आकार देकर उसे पकाया जाता है. इसके दोनों सिरों पर चमड़ा लगाया जाता है और उसे पारंपरिक तरीके से कसकर बांधा जाता है. मांदर की आवाज और उसकी ताल को बेहतर बनाने के लिए चमड़े पर विशेष लेप भी लगाया जाता है, जिसे स्थानीय तौर पर ‘खरन’ कहा जाता है. निर्माण में स्थानीय मिट्टी और पारंपरिक सामग्री के इस्तेमाल का उल्लेख GI आवेदन से जुड़े दस्तावेजों में भी किया गया है. यही पारंपरिक तकनीक एक साधारण मिट्टी के खोल को ऐसा वाद्य बना देती है जिसकी आवाज दूर तक पहचान ली जाती है
इस मांदर की असली ताकत उसके कारीगर हैं
GI टैग की कहानी केवल एक वाद्य यंत्र की कहानी नहीं है. इसके पीछे उन कारीगर परिवारों की मेहनत भी है, जिन्होंने पीढ़ियों से मांदर बनाने की कला को संभालकर रखा. GI आवेदन में गुमला के रायडीह क्षेत्र से जुड़े मांदर उत्पादकों की भूमिका दर्ज है. आवेदन में मांदर को हस्तशिल्प की श्रेणी में रखा गया है. ऐसे में GI पहचान से पारंपरिक निर्माण पद्धति और उससे जुड़े कारीगरों की पहचान को रोजगार के आधार मिलने की उम्मीद है.
पांच साल की प्रक्रिया के बाद मिली मंजिल
मांदर को GI पहचान दिलाने की प्रक्रिया की शुरुआत 24 सितंबर 2021 को आवेदन दाखिल करने से हुई. इसके बाद दस्तावेजों की जांच, अतिरिक्त जानकारी और जवाब, ऐतिहासिक प्रमाण तथा अन्य प्रक्रियाओं से गुजरते हुए मामला आगे बढ़ा.GI Registry के रिकॉर्ड में आवेदन संख्या 777 से जुड़े दस्तावेजों में 2021 से लेकर 2026 तक की प्रक्रिया दर्ज है. जनवरी 2025 में मामले की अंतिम सुनवाई दिल्ली में हुई थी. इसके बाद सितंबर 2026 में ‘Mandar of Jharkhand’ को पंजीकृत दर्जा मिला. इस तरह आवेदन से पंजीकरण तक लगभग पांच साल का समय लगा.मांदर को GI पहचान दिलाने की प्रक्रिया में IP और GI विशेषज्ञ तथा NUSRL रांची के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह की भूमिका भी दर्ज की गई है. उन्होंने आवेदन से लेकर सुनवाई और दस्तावेजी प्रक्रिया में पैरवी की.
मांदर की कहानी आज की नहीं, सौ साल से ज्यादा पुरानी पहचान के दस्तावेज
GI के लिए मांदर की झारखंड से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबद्धता साबित करने के लिए पुराने दस्तावेजों और पुस्तकों का सहारा लिया गया. इसमें मानवशास्त्री शरत चंद्र राय की 1915 की कृति, तारक चंद्र दास की 1931 की कृति, डब्ल्यू. जी. आर्चर की 1940 की The Blue Grove, पटना म्यूजियम की 1920 की वार्षिक रिपोर्ट और भारत सरकार के 1956 के Folk Dances of India जैसे संदर्भ शामिल किए गए. इन दस्तावेजों में मांदर को क्षेत्र के पारंपरिक संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से जोड़े जाने के प्रमाण प्रस्तुत किए गए.
GI टैग आखिर मांदर के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों?
GI टैग किसी ऐसे उत्पाद या वस्तु की भौगोलिक पहचान को मान्यता देता है, जिसकी विशेषता और प्रतिष्ठा किसी खास क्षेत्र से जुड़ी हो. मांदर के मामले में इसका अर्थ है कि ‘Mandar of Jharkhand’ नाम अब झारखंड से जुड़ी इस पारंपरिक पहचान के आधिकारिक पंजीकरण का हिस्सा है.इससे सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि मांदर की पहचान केवल लोककथाओं, गीतों और परंपराओं तक सीमित नहीं रही. अब सरकारी GI रजिस्टर में भी यह झारखंड के नाम के साथ दर्ज है.
मिट्टी से बनी थाप, अब झारखंड के नाम की पहचान
एक तरफ आधुनिक संगीत के दौर में इलेक्ट्रॉनिक बीट और डिजिटल ध्वनियां तेजी से बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ झारखंड का मांदर आज भी अपनी पुरानी थाप के साथ खड़ा है. कभी गांव के किसी कारीगर के हाथों मिट्टी को आकार देकर बनाया गया ,यह वाद्य अब GI रजिस्टर तक पहुंच चुका है. इसकी आवाज में जंगलों की स्मृति है, गांवों की मिट्टी है, पर्वों की खुशी है और पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी की मेहनत है.अब जब मांदर बजेगा, तो उसकी थाप के साथ सिर्फ झारखंड की संस्कृति नहीं गूंजेगी—उसके नाम के साथ झारखंड की आधिकारिक पहचान भी गूंजेगी.यही वजह है कि मांदर को मिला GI टैग झारखंड के लिए केवल किसी एक वाद्य यंत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि लोककला, परंपरा, कारीगर और सांस्कृतिक विरासत को मिली एक नई पहचान के तौर पर देखा जा सकता है.
रिपोर्ट -प्रकाश महतो
