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Jharkhand

TNP Special: जयराम महतो की ‘टाइगर’ से डॉक्टर बनने तक की संघर्ष गाथा, किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

धनबाद (DHANBAD): समय और प्रकृति की एक गति होती है, वह कब किसको, किस काम के लिए चुन ले, यह कोई नहीं जनता. तोपचांची  के मानटांड में 1994 में जन्मा यह अबोध बालक अभी चलना ही सीखा था, कि पिता को खो दिया. फिर तो घर की स्थिति उसे बाध्य कर दी कि वह मामा के घर चला गया और मामा के घर ही उसकी परवरिश हुई. यह बच्चा बचपन में शैतान था, लेकिन लोग कहते थे-तो "टूअर" गीदर लगी, ऐसा कोई काम मत करना, जिससे मामा घर की बदनामी हो. उसी बात ने आज के जयराम महतो को ऐसा झकझोरा कि वह कुछ करने को ठान ली और संघर्षों को गले लगाते हुए बिना धैर्य खोये, बिना घबराए, धीरे-धीरे लेकिन निरंतर आगे बढ़ता चला गया. 2002 में एक ऐसा दौर आया कि वह राजनीति में कूद पड़ा, फिर तो 2024 में उसका जलवा कायम हो गया.  

झारखंड विधानसभा चुनाव में उसकी पार्टी मैदान में उतरी और दमदार मौजूदगी दर्ज की

वह राजनीतिक पार्टी बना चुका था. झारखंड विधानसभा चुनाव में उसकी पार्टी मैदान में उतरी और दमदार मौजूदगी दर्ज की. यह अलग बात है कि जयराम महतो के अलावा कोई विधायक नहीं चुने गए. वह विधायक, विधायकी मिलने से भी संतुष्ट नहीं था, पढ़ाई की जो ज्वाला उसके मन में सुलग रही थी, उसको वह आगे बढ़ाना चाहता था और अंततः शनिवार को उसने पीएचडी की उपाधि हासिल कर लाखों युवाओं का प्रेरणा स्रोत बन गया. झारखंड आंदोलनकारी पिता स्वर्गीय कृष्ण प्रसाद महतो और माता झुपड़ी देवी के बेटे जयराम कुमार महतो की जिंदगी की शुरुआत ही संघर्ष की चौखट पर हुई. पिता की मृत्यु के बाद परिवार पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा. घर चलाने की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई. परिस्थितियां विकट थीं, लेकिन मां ने हार नहीं मानी. हर माँ की तरह वह भी अपने बेटे को आगे बढ़ता देखना चाहती थी. 

बचपन का एक बड़ा हिस्सा जयराम महतो ने अपने मामा के घर बिताया

बचपन का एक बड़ा हिस्सा जयराम महतो  ने अपने मामा के घर बिताया. नाना-नानी, मौसा-मौसी और परिवार के दूसरे सदस्यों ने उनका ख्याल रखा. मामा के घर में उनके नाना बीसीसीएल में नौकरी करते थे. पढ़ाई-लिखाई का माहौल बहुत समृद्ध नहीं था, लेकिन अपनापन भरपूर था.जयराम खुद अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि वे खूब शरारती हुआ करते थे. उन्हें कभी-कभी बहला-फुसलाकर स्कूल भेजा जाता था और फिर यह भी सुनिश्चित किया जाता था कि वे पूरा दिन स्कूल में ही बिताएं.समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया. मामा के घर से जब जयराम वापस अपने घर लौटे, तब उनकी उम्र करीब 15-16 वर्ष थी. अब बचपन पीछे छूट रहा था और जिंदगी की असल जद्दोजहद सामने खड़ी थी.स्कूल से कॉलेज और फिर विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते उनकी उम्र करीब 20-22 वर्ष हो चुकी थी. मगर परिवार की आर्थिक स्थिति अब भी जस की तस थी. 

एक समय ऐसा था, जब परिवार की दाल-रोटी का इंतजाम करने वाला भी नहीं था 

घर में ऐसा कोई कमाने वाला नहीं था, जो पूरे परिवार की दाल-रोटी का इंतजाम कर सके. चाची की विधवा पेंशन और चाचा की विकलांग पेंशन के सहारे परिवार चल रहा था.  उस दौर में महज 200 से 400 रुपये की पेंशन से घर का चूल्हा जलता था.जयराम ने अपनी कई इच्छाओं को उसी उम्र में दफन कर दिया. जब घर में खाने के लाले हों, तब नए कपड़े और जूते मांगना भी किसी अपराध बोध से कम नहीं लगता था.कॉलेज में जब फॉर्म और रजिस्ट्रेशन के लिए पैसे की जरूरत पड़ती, तो वे दोस्तों से थोड़े-थोड़े पैसे इकट्ठा करते और किसी तरह अपना फॉर्म भरते.संघर्ष का यह सिलसिला लंबा चला, लेकिन जयराम की पढ़ाई नहीं रुकी. उनके भीतर एक सपना पल रहा था—पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करना और उस मां के जीवन को थोड़ा आसान बनाना, जिसने तमाम कठिनाइयों के बीच उन्हें पाला था. जयराम के एक चाचा दोनों आंखों से दिव्यांग थे और कोई काम करने की स्थिति में नहीं थे. परिवार की मजबूरियां उन्हें भीतर तक झकझोरती थीं. इसीलिए इंटर के बाद उन्होंने डिफेंस, आर्मी और नेवी की बहालियों में कई बार हिस्सा लिया. कभी दौड़ आड़े आई, कभी मेडिकल जांच और कभी शारीरिक मापदंड. कोशिशें होती रहीं, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी.

नौकरी की तलाश और पढ़ाई के बीच बहुत दिनों तक चलता रहा द्वन्द 

शहीद शक्तिनाथ महतो स्मारक उच्च विद्यालय में करीब तीन साल पढ़ाई की. इसके बाद टाटा सिजुआ में शिक्षा जारी रखी. फिर मानटांड  लौटे और बाघमारा के स्कूल में पढ़ाई की. इसके बाद कतरास कॉलेज से इंटरमीडिएट साइंस की पढ़ाई पूरी की.आगे की राह राजगंज डिग्री कॉलेज तक पहुंची, जहां उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई की. इसके बाद पीके रॉय मेमोरियल कॉलेज में उच्च शिक्षा जारी रखी और आखिरकार विश्वविद्यालय की दहलीज तक पहुंच गए. लेकिन नौकरी की तलाश और पढ़ाई के बीच एक और सपना था, शिक्षक बनने का.ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में जाने की तैयारी शुरू की. मन में था कि शिक्षक बनेंगे, आगे चलकर प्रोफेसर भी बन सकते हैं. बीएड करने की इच्छा भी थी, लेकिन आर्थिक परिस्थिति फिर रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो गई. फीस जुटाना आसान नहीं था. इसी सिलसिले में वे एक नेता के पास भी गए थे. जवाब मिला कि बीएड करना है तो फीस तो लगेगी ही.

एक बार नहीं, बार बार मारनी पड़ी थी अपनी इचछाएं 

लेकिन शायद जिंदगी को उनके लिए कोई दूसरा रास्ता मंजूर था. उनके एक प्रोफेसर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और कहा "आप पढ़ने में अच्छे हैं, पीएचडी में दाखिला क्यों नहीं ले लेते?"यह सलाह जयराम की जिंदगी में एक नया मोड़ लेकर आई. उन्होंने विनोबा भावे विश्वविद्यालय में पीएचडी के लिए दाखिला लिया. इसी बीच विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया और प्रक्रिया बीबीएमकेयू में स्थानांतरित हो गई. लंबे संघर्ष, अध्ययन और शोध के बाद आखिर वह दिन भी आया, जब माइनटांड़ के उस संघर्षशील बच्चे के नाम के आगे डॉक्टर जुड़ गया.बीबीएमकेयू के पीएचडी के शुरुआती बैच में जयराम कुमार महतो ने भी पीएचडी की उपाधि हासिल की है. यह उन वर्षों का प्रतिफल था, जिनमें कभी फॉर्म भरने के लिए दोस्तों से पैसे मांगने पड़े थे, कभी नौकरी के लिए दौड़ लगानी पड़ी थी और कभी परिवार की जरूरतों के आगे अपनी इच्छाओं को कुचलना पड़ा था.  इस उपलब्धि के बाद जयराम ने सबसे पहले अपनी मां को विशेष धन्यवाद दिया. जिस मां ने विपरीत परिस्थितियों में उन्हें पाला था, वही मां उनके फाइनल डिग्री लेने  के दौरान विश्वविद्यालय पहुंची थीं. बेटे की उपलब्धि देखकर उनके चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी. वह विश्वविद्यालय परिसर में बेटे के क्लासरूम तक पहुंचीं और उसकी तरक्की को अपनी आंखों से देखा. शायद उस पल में मां को अपने बेटे की डिग्री से ज्यादा उन तमाम मुश्किल दिनों की याद आई होगी, जिन्हें उन्होंने मिलकर पार किया था.

टीचर टर्न्ड पॉलिटिशियन कैसे बने जयराम महतो 

जयराम की जिंदगी का एक अध्याय शिक्षक के रूप में भी लिखा गया है. बनस्थली उच्च विद्यालय में उन्होंने महज 3400 रुपये मासिक वेतन पर बच्चों को पढ़ाया. वे अपने वेतन में से करीब 500 रुपये रखते और बाकी खर्च कर देते थे. यह खर्च अपनी जरूरतों पर नहीं होता था. बच्चों पर होता था. स्कूल में पढ़ने वाले करीब 74 बच्चों के लिए वे अक्सर मोदी मिक्सचर मंगवाकर खिलाते थे. किसी दिन बच्चों का सिंघाड़ा या जलेबी खाने का मन हुआ, तो वह भी सिर्फ कुछ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि सभी बच्चों के लिए मंगवाते थे.उनके लिए शिक्षक होना सिर्फ ब्लैकबोर्ड पर पाठ लिखना नहीं था. शायद उनके लिए शिक्षक होना बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों का सहभागी बनना था. एक बार राजगंज के पवन वस्त्रालय से उन्होंने करीब 600 रुपये की जैकेट खरीदी. लेकिन लौटते वक्त पता चला कि बच्चों के लिए एक कार्यक्रम में करीब 300 से 400 रुपये की एंट्री फीस देनी होगी. उन्होंने बिना ज्यादा सोचे जैकेट वापस कर दी. उस पैसे से बच्चों की एंट्री फीस जमा कर दी. अपने लिए खरीदी गई जैकेट लौट गई, लेकिन बच्चों के चेहरे की मुस्कान उनके हिस्से रह गई. यही जयराम की कहानी का वह पक्ष है, जो राजनीति के मंच से अलग दिखाई देता है.

रिपोर्ट -प्रकाश महतो