रांची(RANCHI): राज्य में परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठन अब बड़े आंदोलन की रणनीति बना रहे है. आदिवासी संगठन के अगुआ की एक अहम बैठक रविवार को रांची प्रेस क्लब में हुई. जहां आगामी परिसीमन को लेकर चर्चा की गई. जिसमें निर्णय लिया गया की 2 अगस्त को अपने हक और अधिकार को लेकर एक रांची में आदिवासी महाजुटान रैली होगी. जिसमें लाखों आदिवासी परिसीमन के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे.
बैठक में पूर्व मंत्री एवं झारखंड सरकार की समन्वय समिति के सदस्य बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड में लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का आदिवासी समाज पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ने दिया जाएगा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर परिसीमन के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या में कटौती का कोई प्रयास किया गया, तो उसका लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से पुरजोर विरोध किया जाएगा.
उन्होंने कहा कि संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किए हैं. ऐसे में आरक्षित सीटों की संख्या और उनकी मूल भावना को कमजोर करने वाला कोई भी कदम संविधान की आत्मा के विरुद्ध होगा.
सामाजिक कार्यकर्ता व आदिवासी नेता अनिल अमिताभ पन्ना ने कहा, "परिसीमन का प्रश्न केवल सीटों की संख्या का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के राजनीतिक अस्तित्व, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रश्न है. झारखंड की ऐतिहासिक परिस्थितियों और आदिवासी समाज के विस्थापन, पलायन एवं सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखे बिना कोई भी परिसीमन न्यायसंगत नहीं हो सकता.
बैठक में आदिवासी नेताओं ने कहा कि झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण का विषय नहीं, बल्कि अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों, पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रश्न है.
उन्होंने कहा कि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन किया गया, तो आदिवासी बहुल क्षेत्रों की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है और संविधान द्वारा प्रदत्त प्रतिनिधित्व की भावना कमजोर पड़ने का खतरा उत्पन्न होगा. याद दिलाया कि वर्ष 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने झारखंड में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या 28 से घटाकर 22 तथा लोकसभा सीटों की संख्या 5 से घटाकर 4 करने का प्रस्ताव दिया था.
इस प्रस्ताव के विरुद्ध पूरे झारखंड में व्यापक जनआंदोलन हुआ. आदिवासी समाज, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों के संयुक्त संघर्ष के परिणामस्वरूप केंद्र सरकार ने वर्ष 2008 में परिसीमन अधिनियम में संशोधन कर झारखंड की 28 विधानसभा और 5 लोकसभा ST आरक्षित सीटों को वर्ष 2026 तक यथावत बनाए रखा.
अब आगामी परिसीमन के दौरान पुनः वही परिस्थितियां उत्पन्न होने की आशंका है. आदिवासी क्षेत्रों में कम जनसंख्या वृद्धि दर, बड़े पैमाने पर पलायन, खनन एवं औद्योगिक परियोजनाओं के कारण विस्थापन तथा वन एवं पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां जनसंख्या आंकड़ों को प्रभावित करती रही हैं. ऐसे में केवल जनसंख्या को आधार बनाने से आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है.
बैठक में कहा गया झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और पारंपरिक जीवन व्यवस्था के केंद्र हैं. इसलिए परिसीमन की प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद 330, 332 तथा पांचवीं अनुसूची की मूल भावना का पूर्णतः पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
बैठक में कई बिन्दु पर चर्चा की गई है. जिसमें मांग की गई की अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों में किसी भी प्रकार की कटौती स्वीकार नहीं होगी. साथ ही सीटों की संख्या बढ़ने पर ST आरक्षित सीटों की संख्या भी समानुपातिक रूप से बढ़ाई जाए. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता सुरक्षित रखी जाए. परिसीमन की समीक्षा हेतु संवैधानिक एवं जनजातीय विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए. भविष्य में किसी भी परिसीमन प्रक्रिया से अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी न हो, इसके लिए संवैधानिक एवं वैधानिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए.
बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि परिसीमन के संदर्भ में जनजातीय समाज की ओर से एक ड्राफ्टिंग कमेटी गठित की गई है, जो विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सहित विभिन्न संवैधानिक एवं राजनीतिक मंचों पर अपनी बात रखेगी. साथ ही आगामी 2 अगस्त 2026 को रांची में "आदिवासी एकता महाजुटान रैली" आयोजित करने का निर्णय लिया गया.
