रांची (RANCHI): झारखंड की चर्चित आदिवासी नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता निशा भगत की मौत की खबर ने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है. आदिवासी समाज के अधिकारों, सरना धर्म, जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अस्मिता जैसे मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखने वाली निशा भगत ने आत्महत्या का प्रयास किया था. इस कदम से पहले वह सोशल मीडिया पर लाइव आई थीं, जहां उन्होंने अपनी परेशानियों और संघर्षों का जिक्र करते हुए कई गंभीर बातें कही थीं. घटना के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं. हालांकि, उनकी मौत से जुड़ी परिस्थितियों और लाइव वीडियो में लगाए गए आरोपों की जांच होनी बाकी है.
निशा भगत की पहचान सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता या आदिवासी नेत्री तक सीमित नहीं थी. वह अपनी बेबाक बयानबाजी और आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के लिए भी जानी जाती थीं. आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर वह अक्सर खुलकर अपनी राय रखती थीं. सरना धर्म कोड, आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और धर्मांतरण जैसे विषयों पर उनके विचार कई बार चर्चा में रहे. दिसंबर 2025 में सरना धर्म कोड की मांग और धर्मांतरण के विरोध में उन्होंने अपना सिर मुंडवाकर विरोध दर्ज कराया था.
गुमला में बीता बचपन, उर्सलाइन कॉन्वेंट से हुई शुरुआती पढ़ाई
निशा भगत मूल रूप से गुमला जिले की रहने वाली थीं. उनकी शुरुआती पढ़ाई गुमला के उर्सलाइन कॉन्वेंट में हुई थी. इसके बाद उन्होंने कार्तिक उरांव कॉलेज से विज्ञान विषय की पढ़ाई की. अपने एक साक्षात्कार में बचपन और स्कूली जीवन के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया था कि वह पढ़ाई में बहुत अच्छी नहीं थीं और उन्हें कई बार परीक्षाओं में असफलता का सामना भी करना पड़ा था. हालांकि, इन परिस्थितियों ने उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोका. उन्होंने यह भी बताया था कि जिस स्कूल में कभी वह एक सामान्य छात्रा के रूप में पढ़ा करती थीं, बाद में उसी संस्थान में उन्हें विद्यार्थियों के बीच अपने अनुभव साझा करने और उन्हें प्रेरित करने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा.
दुर्गापुर से होटल मैनेजमेंट, बेंगलुरु में किया काम
निशा भगत ने अपने जीवन में कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया. उन्होंने दुर्गापुर से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद बेंगलुरु स्थित आईटीसी में नौकरी की. आगे चलकर उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की और पत्रकारिता के क्षेत्र से भी जुड़ीं. एक बातचीत में उन्होंने अलग-अलग शहरों में रहने और विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के अपने अनुभवों का जिक्र किया था. उनका मानना था कि गांव से बाहर निकलकर अलग-अलग लोगों, समाजों और विचारधाराओं को समझने से व्यक्ति का नजरिया व्यापक होता है. यही वजह रही कि उन्होंने अपने करियर को किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा. वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्होंने गुमला सीट से झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के उम्मीदवार के तौर पर भी चुनाव लड़ा था.
पिता के संघर्षों ने बनाया समाज के प्रति संवेदनशील
निशा भगत के व्यक्तित्व और विचारों पर उनके पिता के संघर्षों का गहरा प्रभाव रहा. उनके पिता झारखंड आंदोलन से जुड़े हुए थे. आंदोलन के दौरान उन्हें लंबे समय तक जेल में भी रहना पड़ा था. इस संघर्ष का असर पूरे परिवार पर पड़ा. परिवार को आर्थिक और सामाजिक परेशानियों से गुजरना पड़ा. यहां तक कि उनका घर भी जला दिया गया था. बचपन में उन्होंने अपने पिता पर हुए हमलों को भी करीब से देखा था.
उनका परिवार माता-पिता और तीन भाई-बहनों का था. वह दो भाइयों के बीच इकलौती बहन थीं. उनके छोटे भाई झारखंड पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं, जबकि बड़े भाई ने उनके साथ निर्माण कार्य के क्षेत्र में काम किया था. निशा भगत ने सरकारी ठेकेदार के रूप में भी अपनी पहचान बनाई थी. उन्होंने पुल, पीसीसी सड़क और स्कूल भवनों के निर्माण जैसे काम कराए. उन इलाकों में भी निर्माण कार्य किया, जहां माओवादी गतिविधियों के कारण दूसरे ठेकेदार काम करने से कतराते थे.
आदिवासी पहचान, भाषा और संस्कृति से था गहरा लगाव
निशा भगत अपनी आदिवासी पहचान और पारंपरिक संस्कृति को लेकर काफी सजग थीं. वह कुड़ुख भाषा बोलती थीं और अपनी मातृभाषा को बचाने की जरूरत पर जोर देती थीं. बातचीत के दौरान भी वह अक्सर आदिवासी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की बात करती थीं. उनका मानना था कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए. करम पर्व के गीतों और आदिवासी रीति-रिवाजों से भी उनका विशेष जुड़ाव था.
धमकी और विवादों को लेकर भी रही थीं चर्चा में
निशा भगत कई आंदोलनों और विवादों के कारण भी सुर्खियों में रही थीं. जुलाई 2026 में उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से जान से मारने की धमकी मिलने और पांच लाख रुपये की रंगदारी मांगे जाने की शिकायत रांची साइबर थाने में दर्ज कराई थी. उन्होंने धमकी देने वाले व्यक्ति के प्रिंस खान गिरोह से जुड़े होने का आरोप लगाया था. इस मामले में पुलिस जांच की खबरें भी सामने आई थीं. इसके अलावा रिम्स और डीआईजी मैदान के आसपास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के विरोध के दौरान भी वह चर्चा में आई थीं. इस मामले में उनके खिलाफ सदर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी. बाद में 8 जुलाई 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत दे दी थी.
