TNPDESK: झारखंड के कोल्हान में लाल आतंक के गहरे जख्म है. यहाँ की जमीन सांसद से लेकर आम बेकसूर के खून से लाल हुई है. अब फिर पूर्वी सिंघ भूम में सांसद हत्याकांड की याद ताज़ा हो गई. कैसे एक खेल के मैदान में अचानक एके 47 लेकर अचानक नक्सली पहुंचे और सामने खड़े सांसद ,नेता और पुलिस वालों पर अंधाधुन गोली चलाने लगे. सबसे बड़ी बात इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले नक्सलियों को पुष्पा नामक महिला कमांडर लीड कर रही थी. आखिरकार अब 20 साल बाद पुष्पा ने हथियार डाल दिया. और नई शुरुआत की है. इस रिपोर्ट में जानेंगे पुष्पा के शकुंतला बनने की कहानी और कैसे पूर्वी सिंहभूम के गाँव की जमीन सांसद के खून से लाल हुई हुई थी.
04 मार्च 2004 को सांसद खेल मैदान पहुंचे
तारीख 04 मार्च 2004 जगह पूर्वी सिंह भूम जिला का घाटशिला इलाका और इस इलाके के बीहड़ में बसे बकुरिया गाँव. इस गाँव में आम दिन की तरह लोगों के दिन की शुरुआत हुई. बच्चे स्कूल जाने के लिए घर से निकले. गाँव के लोग दोपहर गाँव के मैदान में होने वाले फुटबॉल मैच की तैयारी कर रहे थे. समय करीब 1 बजा पूरा गाँव मैदान में जुटा और फिर सांसद सुनील महतो के साथ कई स्थानीय नेता मैच का उद्घाटन करने पहुंचे. यहाँ माँदर ढोल नगाड़े के साथ सांसद का स्वागत किया गया. फिर मैच की शुरुआत हुई.
पहले अंगरक्षक को गोली लगी
अब तक सब कुछ सामान्य चल रहा था. इसी बीच भीड़ में कुछ हथियार बंद माओवादी पहुंचे. पूरे इलाके को धीरे धीरे अपने घेरे में लिया. फिर अचानक सबसे पहले पुष्पा उर्फ शकुंतला एके 47 से गोली चलाते हुए आगे बढ़ी. गोली की आवाज सुनते ही मैदान में अफरा तफरी मच गई. खतरा को देखते हुए सांसद के अंगरक्षक ने सांसद को घेरे में लिया. लेकिन नक्सलियों की संख्या अधिक हो गई और सीधे सामने मौजूद अंगरक्षक को गोली मारी फिर सांसद सुनील महतो के सीने में अंधाधुन गोली मारी.
सांसद की मौत के बाद नक्सलियों ने मनाया जश्न
लेकिन इसके बाद भी नक्सलियों का मन नहीं भरा और सांसद के सीने पर चढ़ कर जश्न मनाया. इसके बाद पूरे मैदान में सन्नाटा पसर गया. लोग घरों में दुबक गए. देखते ही देखते नक्सली लाल सालम का नारा लगाने लगे और फिर जंगल की ओर निकल गए. घटना की जानकारी पुलिस को मिली. जिसके बाद पुलिस पहुंच कर अपनी तहकीकात शुरू किया. गाँव के लोगों से जानकारी लेने की कोशिश की. लेकिन कोई कुछ बोलने से परहेज कर रहा था. पुलिस को उनके सूत्रों ने बताया कि घटना को अंजाम देने वाली नक्सली पुष्पा थी. उसके साथ उसके दस्ते के दर्जनों साथी पहुंचे और फिर कत्लेआम मचाया.
11 माओवादियों की हत्या का बदला
बताया जाता है कि इस घटना के पीछे 2004 में ही कुछ समय पहले गाँव के लोगों ने 11 माओवादियों को मौत के घाट उतारा था. और इस हत्या के पीछे नक्सली स्थानीय सांसद को आरोपी मानते थे. इसी हत्याकांड का बदला लेने के लिए नक्सलियों सांसद को निशाना बनाया. ऐसे फुटबॉल मैदान को चुना जहां बैकअप फोर्स पहुँचने में समय लगे. साथ ही वह आराम से घटना को अंजाम देने के बाद फरार हो जाए. इनके प्लान के मुताबिक सब कुछ सही रहा और फुटबॉल मैदान हमेशा के लिए सांसद के यादों का मैदान बन गया.
शकुंतला 10 साल की उम्र में संगठन में हुई शामिल
अब शकुंतला ने इस घटना के 22 साल बाद सरेंडर कर दिया और मुख्यधारा में लौट गई. ऐसे में हर कोई जानना चाह रहा है कि आखिर शकुंतला कौन है. कहाँ की रहने वाली है. इसकी पूरी कहानी क्या है. बताया जाता है कि शकुंतला एक गरीब परिवार से आती है. शुरू से गाँव के साहूकारों का अत्याचार इसने देखा. इसी बीच इसने 10 साल की ही उम्र में नक्सलवाद का रास्ता चुन लिया. और देखते ही देखते एक बड़ी माओवादी कैडर बन गई. इसपर 10 लाख रुपये क इनाम था.
2005 में नक्सली कमांडर से की शादी
शकुंतला का नाम संगठन में कई है. इसे इसके साथी वर्षा,परी के नाम से भी जाना जाता है. लेकिन इसका घर का नाम पुष्पा था. पुष्पा मूल रूप से पश्चिम बंगाल के झारग्राम के बेलपहाड़ी की रहने वाली है.यह इलाका झारखंड से सटा हुआ है. ऐसे में झारखंड और बंगाल के नक्सली हमेशा इधर से उधर आते जाते रहते थे. इस बीच ही झारग्राम में पुष्पा की मुलाकात 2005 के समय नक्सली कमांडर अतुल महतो से हुई. अतुल भी पुष्पा से मिल कर खुश हुआ. इस बीच दोनों में नजदीकी बढ़ी और फिर मोहब्बत हो गई. आखिर में दोनों ने शादी की. लेकिन दोनों ने कभी संगठन नहीं छोड़ा.
2005 से 2026 तक मचाया आतंक
दोनों कई घटनाओं में शामिल रहे. झारग्राम से लेकर कोल्हान और अन्य इलाकों में इनके नाम की दहशत बनने लगी. कुखार कमांडर में इनकी गिनती आने लगी. और 2005 से 2026 तक यह हमेशा पुलिस और सुरक्षा बल के जवानों को चकमा देकर बचते रहे. लाख अभियान चला कार्रवाई हुई लेकिन कही भी इनकी कोई जानकारी नहीं मिली.
अब खत्म हुआ लालआतंक का चैप्टर
आखिर में अब 18 जून 2026 को शकुंतला बंगाल के लाल बाजार थाना पहुंची. हाथ में हथियार था. और फिर इसने सरेंडर करने की घोषणा कर दी. पुलिस के सामने हथियार डाल कर अपने ज़िंदगी की नई शुरुआत की है. जहां पुलिस अधिकारियों ने शकुंतला का स्वागत किया और सम्मानित किया. साथ ही सरकार के कई लाभ दिलाने का भरोसा दिया है. और इसी के साथ आतंक का चैप्टर हमेशा के लिए खत्म हो गया.