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Jharkhand

JPSC घोटाले में CID की चार्जशीट से बड़ा खुलासा, पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते को बताया पूरे खेल का मास्टरमाइंड, जानिए दूसरे सदस्यों की क्या थी भूमिका?

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

रांची (RANCHI): झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं में कथित धांधली, पेपर लीक, अनियमितता और ओएमआर शीट में छेड़छाड़ के मामले में CID की चार्जशीट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जांच में आयोग के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं. दरअसल CID के मुताबिक, परीक्षा संचालन से जुड़ी प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं से लेकर डिजिटल साक्ष्य मिटाने की कोशिश तक, मामले में कई अहम कड़ियां मिली हैं. चार्जशीट में परीक्षा नियंत्रक के अधिकार छीने जाने, विवादित एजेंसी को काम सौंपने और अभ्यर्थियों से कथित तौर पर मोटी रकम वसूलने जैसे आरोपों का भी जिक्र किया गया है.

ऐसे में CID की चार्जशीट के अनुसार, पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांग्ते ने परीक्षा संचालन का जिम्मा मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड यानी TDPL को सौंपा था. जांच एजेंसी का आरोप है कि एजेंसी को वैध टेंडर प्रक्रिया के बिना नामांकन के आधार पर काम दिया गया. बताया गया है कि इस एजेंसी को मई 2025 में तथ्य छिपाने के आरोप में तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया था.

इसके अलावा चार्जशीट में कहा गया है कि तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक असीम केरकेट्टा ने एजेंसी की नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी. इसके बाद उनके अधिकार सीमित कर दिए गए और परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता को सौंप दी गई. जांच में यह आरोप भी सामने आया कि दूसरे विभाग में तबादला होने के बावजूद श्वेता कुमारी गुप्ता को आयोग में ही बनाए रखा गया.

चार्जशीट में 22 जुलाई 2026 को JPSC कार्यालय में हुई CID की छापेमारी का भी जिक्र है. जांच एजेंसी के अनुसार, छापेमारी के तुरंत बाद तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. CID ने आरोप लगाया है कि इस दौरान सरकारी लैपटॉप और पेन ड्राइव में मौजूद डिजिटल साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश की गई. हालांकि, फॉरेंसिक जांच के दौरान एजेंसी ने मिटाए गए महत्वपूर्ण डेटा को रिकवर कर लिया. जांचकर्ताओं का मानना है कि इन डिजिटल साक्ष्यों से परीक्षा में कथित गड़बड़ी और संबंधित लोगों के बीच संपर्क की कड़ियों को समझने में मदद मिली.

CID की जांच में अभ्यर्थियों से नौकरी दिलाने के नाम पर बड़ी रकम वसूले जाने का आरोप भी सामने आया है. चार्जशीट के मुताबिक, प्रारंभिक परीक्षा में सफल कराने के लिए कथित तौर पर 5 लाख से 10 लाख रुपये तक मांगे जाते थे. वहीं, अंतिम चयन के लिए 80 लाख से एक करोड़ रुपये तक की रकम तय होने की बात कही गई है. तकनीकी जांच के आधार पर CID ने आरोप लगाया है कि एल. खियांग्ते का संपर्क परीक्षा में कथित धांधली से जुड़े सिंडिकेट और निजी एजेंसी के प्रमुख सदस्यों से था. जांच एजेंसी ने इन संपर्कों को मामले की अहम कड़ी माना है.

चार्जशीट में सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 की आधिकारिक आंसर-की से संबंधित गंभीर आरोप भी दर्ज हैं. CID के अनुसार, आधिकारिक उत्तर कुंजी जारी होने से पहले ही उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता ने अपने मोबाइल से TDPL कर्मचारी उस्मान को व्हाट्सएप के जरिए इसे भेज दिया था. जांच एजेंसी अब इस कथित घटनाक्रम के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि परीक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी बाहरी लोगों तक कैसे पहुंची और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका थी.

जांच में फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (FRO) मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं आयोग के कार्यालय से बाहर निजी कंप्यूटरों पर मिलने की बात भी सामने आई है. CID की चार्जशीट के अनुसार, कथित सिंडिकेट ने FRO परीक्षा की 350 से अधिक और सहायक वन संरक्षक (ACF) परीक्षा की 150 से अधिक ओएमआर शीट में हेराफेरी की थी. इस मामले में CID ने गवाहों के बयान, दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य अदालत में जमा किए हैं. अब न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी. चार्जशीट में सामने आए आरोपों के बाद JPSC परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवाल और गंभीर हो गए हैं.