रांची (RANCHI): झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे जांच एजेंसी CID की कार्यशैली को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं एक तरफ गिरफ्तारी का सिलसिला लगातार आगे बढ़ा है और दूसरी तरफ जांच से जुड़ी कई ऐसी जानकारियां मीडिया में लगातार सामने आ रही हैं, जिनका आधिकारिक स्रोत स्पष्ट नहीं होता.
रिपोर्टों के मुताबिक अब तक इस मामले में 22 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है इनमें JPSC के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते, आयोग से जुड़े कर्मचारी, परीक्षा संचालन से जुड़ी एजेंसी के लोग और कथित तौर पर परीक्षा में लाभ लेने वाले लोग शामिल हैं 18 अगस्त को मुख्य आरोपी बताए जा रहे अभय तिवारी की पत्नी और भाई की गिरफ्तारी के बाद यह संख्या 22 तक पहुंचने की खबर सामने आई
लेकिन सवाल यह है कि अगर 22 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, तो जांच की आधिकारिक तस्वीर और विस्तृत जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं है?
गिरफ्तारी की खबर आती है, लेकिन तस्वीर और विस्तृत ब्रीफिंग क्यों नहीं?
किसी बड़े भर्ती परीक्षा घोटाले में गिरफ्तारी अपने आप में महत्वपूर्ण कार्रवाई होती है जनता यह जानना चाहती है कि गिरफ्तार व्यक्ति कौन है, उस पर क्या आरोप हैं, जांच में उसके खिलाफ क्या साक्ष्य मिले हैं और कथित सिंडिकेट में उसकी भूमिका क्या थी
CID ने कई गिरफ्तारियों की जानकारी दी है उदाहरण के लिए, अगस्त की शुरुआत में तीन आरोपियों की गिरफ्तारी के संबंध में CID की ओर से केस नंबर और आरोपों की जानकारी सामने आई थी बाद में पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांगते समेत कई अन्य लोगों की गिरफ्तारी की खबर भी सामने आई
लेकिन पूरी जांच की तस्वीर सामने रखने वाली नियमित प्रेस ब्रीफिंग या गिरफ्तार आरोपियों की विस्तृत प्रोफाइल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं दिखती
यहां एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करना जरूरी है—हर गिरफ्तारी में आरोपी की तस्वीर सार्वजनिक करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है जांच एजेंसी कई बार जांच की संवेदनशीलता, पहचान की पुष्टि, आगे की कार्रवाई या अन्य कानूनी कारणों से तस्वीरें सार्वजनिक नहीं करती
लेकिन इस मामले का आकार देखते हुए सवाल फिर भी जायज है कि CID की आधिकारिक सूचना और मीडिया में चल रही जानकारी के बीच इतना अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?
दूसरा बड़ा सवाल—पूछताछ की खबरें आती कहां से हैं?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा दिलचस्प पहलू यही है
मीडिया रिपोर्टों में लगातार यह बताया जा रहा है कि CID ने किस अधिकारी से पूछताछ की, किस आरोपी से क्या जानकारी मिली, किसके बयान के आधार पर कौन-सा लिंक सामने आया और जांच किस दिशा में बढ़ रही है
मसलन, JSSC सचिव सुधीर गुप्ता समेत अधिकारियों से पूछताछ और दस्तावेजों की जांच की खबरें सामने आईं इसी तरह मुख्य आरोपी अभय तिवारी से पूछताछ के आधार पर कथित नेटवर्क और परीक्षा के 'रेट' से जुड़ी जानकारियां भी मीडिया में प्रकाशित हुईं
सवाल यह नहीं है कि मीडिया को ऐसी जानकारी क्यों मिल रही है सवाल यह है कि इन खबरों का आधिकारिक स्रोत क्या है?
अगर CID यह जानकारी आधिकारिक तौर पर साझा कर रही है, तो फिर बाकायदा प्रेस नोट, ब्रीफिंग या आधिकारिक बयान क्यों नहीं?
और अगर CID ने यह जानकारी साझा नहीं की है, तो फिर जांच से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां मीडिया तक कैसे पहुंच रही हैं?
यही वह बिंदु है जहां पूरी जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा होता है
क्या 'लीक' हो रही खबरें जांच को प्रभावित कर सकती हैं?
किसी जांच में मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से लगातार पूछताछ और संभावित बयानों की जानकारी बाहर आने का एक दूसरा पहलू भी है
यदि किसी आरोपी को पहले से यह पता चल जाए कि जांच एजेंसी उससे जुड़े किन तथ्यों की पड़ताल कर रही है, किन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं या किस दिशा में जांच आगे बढ़ रही है, तो इससे जांच की रणनीति प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता
हालांकि यह कहना कि CID जानबूझकर मीडिया में खबरें प्लांट करा रही है, बिना ठोस प्रमाण के उचित नहीं होगा लेकिन CID से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि यदि खबरें उसके आधिकारिक स्रोत से नहीं आ रही हैं, तो क्या एजेंसी ने ऐसी सूचनाओं के लीक होने की जांच की है?
JSSC-CGL की पुरानी जांच भी सवालों के घेरे में रही
इस मामले में CID की मौजूदा कार्यशैली पर सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि JSSC-CGL की पिछली जांच को लेकर झारखंड हाईकोर्ट पहले ही असंतोष जता चुका है.सितंबर 2025 में हाईकोर्ट ने JSSC-CGL पेपर लीक मामले की जांच के स्तर को संतोषजनक नहीं माना था
यही वजह है कि आज जब उसी भर्ती व्यवस्था से जुड़े नए और बड़े स्तर के आरोपों की जांच हो रही है, तब छात्रों और आम लोगों की नजर CID की हर कार्रवाई पर है
सवाल केवल गिरफ्तारी का नहीं है सवाल यह है कि क्या जांच उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचेगी जिसने कथित तौर पर परीक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया?
JPSC में पूर्व अध्यक्ष की गिरफ्तारी के बाद भी कई सवाल बाकी
CID की कार्रवाई का दायरा JPSC के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांगते तक पहुंच चुका है उन्हें 14वीं सिविल सेवा परीक्षा में कथित अनियमितताओं के मामले में गिरफ्तार किया गया है
इसी मामले में JPSC की पूर्व सदस्य अजिता भट्टाचार्य के निजी सहायक बीएन राम की गिरफ्तारी की खबर भी सामने आई उस पर कथित तौर पर इंटरव्यू मैनेज कराने के नाम पर 40 लाख रुपये लेने का आरोप बताया गया है
लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल है—जिस व्यक्ति पर कथित लेन-देन का आरोप है, उससे जुड़े पूरे नेटवर्क की जांच किस स्तर तक पहुंची?
किससे पूछताछ हुई? किसके बयान दर्ज हुए? क्या पैसे के लेन-देन का कोई दस्तावेजी या डिजिटल साक्ष्य मिला? और क्या इस कथित नेटवर्क में ऊपर तक किसी की भूमिका सामने आई?
इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने से पहले देना संभव नहीं है, लेकिन इन्हें सार्वजनिक रूप से उठाना इसलिए जरूरी है क्योंकि मामला हजारों-लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा है
22 गिरफ्तारियां, लेकिन असली सवाल अभी बाकी
22 गिरफ्तारियां निश्चित रूप से छोटी कार्रवाई नहीं हैं CID ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में छापेमारी की है और सात अन्य आरोपियों की तलाश की खबर भी सामने आई है
लेकिन किसी भी बड़े घोटाले की सफलता गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की पहचान, पैसे के स्रोत, परीक्षा प्रक्रिया में सेंध के तरीके और जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने से तय होती है
यही वजह है कि आज छात्रों का सवाल केवल यह नहीं है कि कितने लोग गिरफ्तार हुए
सवाल यह है—
- गिरफ्तार लोगों की भूमिका क्या थी?
- परीक्षा का सिस्टम कैसे प्रभावित हुआ?
- किसके इशारे पर या किस नेटवर्क के जरिए यह पूरा खेल चला?
- पैसा कहां से आया और कहां गया?
- जांच में सामने आ रहे तथ्यों की आधिकारिक जानकारी जनता तक क्यों नहीं पहुंच रही?
और सबसे महत्वपूर्ण—
मीडिया में रोजाना जांच से जुड़ी नई-नई जानकारियां किस स्रोत से आ रही हैं?
CID को अब इन सवालों का जवाब देना चाहिए
- आज जब सरकार ने भर्ती परीक्षाओं को लेकर बड़े फैसले लिए हैं और 22 परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय विवाद का विषय बना हुआ है, तब जांच की विश्वसनीयता और भी महत्वपूर्ण हो गई है हाल में झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार के परीक्षा रद्द करने के फैसले पर अंतरिम रोक भी लगाई है
- वहीं, 24 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने JPSC परीक्षा में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग वाली याचिका पर केंद्र और झारखंड सरकार को नोटिस जारी किया है
- ऐसे माहौल में CID की जिम्मेदारी केवल आरोपियों को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं रह जाती उसे यह भरोसा भी पैदा करना होगा कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और किसी दबाव से मुक्त है
- तस्वीर जारी करना हर मामले में अनिवार्य नहीं है लेकिन जब एक तरफ गिरफ्तारी और पूछताछ की खबरें लगातार मीडिया में आ रही हों और दूसरी तरफ आधिकारिक तौर पर जांच की सीमित जानकारी सामने आ रही हो, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे
- क्या मीडिया में आ रही सूचनाएं CID के आधिकारिक स्रोत से हैं?
- अगर हैं, तो आधिकारिक ब्रीफिंग क्यों नहीं?
- और अगर नहीं हैं, तो जांच की संवेदनशील जानकारी बाहर कैसे जा रही है?
इन सवालों का जवाब CID को देना चाहिए.
क्योंकि यह केवल एक परीक्षा घोटाले की जांच नहीं है. यह झारखंड के उन लाखों युवाओं के भरोसे की जांच भी है, जो वर्षों से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं.
गिरफ्तारियों का आंकड़ा बढ़ना जांच की प्रगति का संकेत हो सकता है, लेकिन जांच की विश्वसनीयता तभी बनेगी जब उसके निष्कर्ष भी उतने ही स्पष्ट और प्रमाणित तरीके से जनता के सामने आएंगे.
