Jharkhand

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि, जानिए कैसे बने झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े जननायक

Rashmi Prasad  CE
Rashmi Prasad CE
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रांची (RANCHI): आज, 4 अगस्त, झारखंड आंदोलन के महानायक और 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि है. यह दिन केवल एक जननेता को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उस संघर्ष, संकल्प और विचारधारा को याद करने का भी दिन है, जिसने झारखंड को उसकी अलग पहचान दिलाई. उनके निधन से भारतीय राजनीति के एक गौरवशाली और संघर्षशील युग का अंत हो गया. शिबू सोरेन, जिन्हें देश और खासकर झारखंड की जनता 'दिशोम गुरु' यानी जनजातीयों के गुरु के रूप में सम्मान देती है, केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक युगद्रष्टा, आंदोलनकारी और सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, गरीबों और शोषितों के अधिकारों की लड़ाई में समर्पित कर दिया. आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और जनसेवा की विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी. झारखंड की राजनीति, समाज और इतिहास में उनका योगदान सदैव अमिट रहेगा.

कौन थे शिबू सोरेन?

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. वे संथाल जनजाति से थे. उनके पिता सोवरन सोरेन आदिवासियों की जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन महाजनों ने उनकी हत्या कर दी. इस घटना ने शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल दी और कम उम्र में ही उन्होंने अन्याय, शोषण और महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़ने का संकल्प लिया. गरीबी और संघर्षों के बीच पले-बढ़े शिबू सोरेन ने औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त की, लेकिन उनका वास्तविक जीवन-पाठ जनता के बीच रहकर मिला. उन्होंने बहुत जल्द समझ लिया था कि आदिवासी समाज की सबसे बड़ी समस्याएं जमीन से बेदखली, आर्थिक शोषण और सामाजिक उपेक्षा हैं. इन्हीं मुद्दों को उन्होंने अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन का आधार बनाया और आजीवन आदिवासियों, किसानों और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे.

झारखंड राज्य निर्माण में अहम भूमिका

अलग झारखंड राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में शिबू सोरेन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही. 1970 के दशक से उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के माध्यम से आदिवासियों, मूलवासियों, किसानों और मजदूरों को संगठित कर अलग राज्य के आंदोलन को जनआंदोलन का स्वरूप दिया. उन्होंने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के साथ क्षेत्रीय पहचान, संसाधनों पर स्थानीय लोगों के हक और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार उठाया. करीब तीन दशकों तक चले लंबे संघर्ष, जनआंदोलनों, धरना-प्रदर्शनों और राजनीतिक प्रयासों के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड भारत का 28वां राज्य बना. यह तिथि भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर चुनी गई, जिसने इस ऐतिहासिक उपलब्धि को और अधिक प्रतीकात्मक बना दिया. हालांकि झारखंड राज्य बनने के समय राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी बने, लेकिन अलग राज्य के आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने और उसे मजबूत राजनीतिक आधार देने में शिबू सोरेन का योगदान सबसे अहम माना जाता है.

शिबू सोरेन ने केवल मंचों से भाषण नहीं दिए, बल्कि गांव-गांव जाकर लोगों को आंदोलन से जोड़ा, जनसभाएं कीं, रैलियां निकालीं और केंद्र सरकार के सामने झारखंड की मांग को लगातार मजबूती से रखा. यही कारण है कि उन्हें झारखंड आंदोलन का प्रमुख शिल्पकार और 'दिशोम गुरु' के नाम से सम्मानित किया जाता है. उनका संघर्ष आज भी झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है.

राजनीतिक सफर: संसद से मुख्यमंत्री पद तक

जनआंदोलनों से अपनी पहचान बनाने वाले शिबू सोरेन ने बाद में राष्ट्रीय राजनीति में भी मजबूत जगह बनाई. वे कई बार झारखंड के दुमका लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए संसद पहुंचे और आदिवासियों, किसानों तथा झारखंड के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया. केंद्र सरकार में उन्होंने कोयला मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. अलग झारखंड राज्य बनने के बाद वे 2005, 2008 और 2009 में तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने. हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और जनाधार हमेशा मजबूत बना रहा. गांवों से लेकर विधानसभा और संसद तक उनकी सीधी पकड़ उन्हें झारखंड की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बनाती रही.

राजनीतिक जीवन में विवाद भी रहे साथ

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन उपलब्धियों के साथ-साथ कई विवादों से भी जुड़ा रहा. उनके खिलाफ अलग-अलग समय पर कई मामले दर्ज हुए और उन्हें कानूनी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा. कुछ मामलों में वे दोषी ठहराए गए, जबकि कई मामलों में उन्हें अदालतों से राहत मिली. इन विवादों के बावजूद उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता और जनसमर्थन में बड़ी कमी नहीं आई. झारखंड के बड़े हिस्से में वे आजीवन 'दिशोम गुरु' और आदिवासी अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक बने रहे.

परिवार और राजनीतिक विरासत

शिबू सोरेन ने केवल एक राजनीतिक दल की स्थापना नहीं की, बल्कि ऐसी विरासत छोड़ी जिसने झारखंड की राजनीति को नई दिशा दी. उनके बड़े बेटे हेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं और कई बार झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री भी है. आज भी झारखंड मुक्ति मोर्चा की राजनीति में शिबू सोरेन की विचारधारा और संघर्ष की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. उनके परिवार ने झारखंडी पहचान, जल, जंगल और जमीन के मुद्दों को आगे बढ़ाने का प्रयास जारी रखा है.

पद्म भूषण से सम्मानित

उनके जानें के लगभग एक साल बाद 23 जून 2026 को झारखंड आंदोलन के महानायक और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद भवन में आयोजित विशेष समारोह में उनकी पत्नी रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया.

आदिवासी समाज के उत्थान, अलग झारखंड राज्य आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका और दशकों तक जनसेवा के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया. यह सम्मान उनके संघर्ष, नेतृत्व और झारखंड की अस्मिता के प्रति समर्पण का राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सम्मान माना गया.