रांची (RANCHI): रांची के होटल चाणक्य बीएनआर में चल रहे 5वें AIOS मिड-टर्म कॉन्फ्रेंस 2026 का रविवार को समापन हो गया. तीन दिवसीय सम्मेलन में देशभर से आए नेत्र विशेषज्ञों ने आंखों से जुड़ी गंभीर बीमारियों, नई तकनीकों और इलाज के तरीकों पर चर्चा की. सम्मेलन में 1500 से अधिक विशेषज्ञ और प्रतिभागी शामिल हुए.
इस दौरान, AIIMS प्रशिक्षित ROP विशेषज्ञ डॉ. बिभूति कश्यप ने प्रीमैच्योर बच्चों की आंखों की जांच को लेकर अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी यानी ROP का खतरा रहता है. शुरुआत में बच्चे की आंखें सामान्य दिखाई दे सकती हैं, इसलिए लक्षण का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है. कम वजन, कम गर्भावधि, लंबे समय तक ऑक्सीजन या वेंटिलेटर की जरूरत और NICU में भर्ती जैसे कारण ROP का खतरा बढ़ा सकते हैं. समय पर जांच होने पर लेजर और अन्य आधुनिक उपचारों से बच्चे की दृष्टि बचाने की संभावना रहती है.
वहीं, AIOS के मानद महासचिव डॉ. संतोष जी. होनावर ने बच्चों की आंखों में दिखने वाली सफेद चमक को नजरअंदाज नहीं करने की सलाह दी. फोटो खींचते समय पुतली में सफेद चमक रेटिनोब्लास्टोमा यानी आंख के कैंसर का संकेत हो सकती है. इसके अलावा अचानक भेंगापन, आंखों में लालिमा, दर्द या दृष्टि में कमी जैसे लक्षणों पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जांच कराने की जरूरत है.
वहीं ग्लूकोमा विशेषज्ञ डॉ. मनोज माथुर ने कहा कि ग्लूकोमा धीरे-धीरे दृष्टि को नुकसान पहुंचाता है और शुरुआत में इसके लक्षण नजर नहीं आते. 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित आंखों की जांच जरूरी है. परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास होने पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. उन्होंने कहा कि समय पर जांच और नियमित इलाज से बची हुई दृष्टि को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है.
सम्मेलन के अंतिम दिन कॉर्निया, ग्लूकोमा, ऑकुलोप्लास्टी और न्यूरो-ऑप्थल्मोलॉजी समेत कई विषयों पर सत्र हुए. समापन समारोह में सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र, पोस्टर और वीडियो प्रस्तुतियों के विजेताओं को सम्मानित किया गया.
