Jharkhand

पुण्यतिथि विशेष: कोल्हान के ‘मांझी बाबा’ से झारखंड के मंत्री तक, ऐसा रहा रामदास सोरेन का सफर

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK):15 अगस्त का दिन देश के लिए जश्न का दिन था, लेकिन साल 2025 में इसी दिन झारखंड के एक बड़े जननेता के जाने से कोल्हान की धरती गम में डूब गई थी. घोड़ाबांधा गांव में उस दिन तिरंगा तो शान से लहरा रहा था, लेकिन लोगों की आंखों में आंसू थे. दिल्ली से आई एक खबर ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया था, झारखंड के तत्कालीन स्कूली शिक्षा मंत्री और कोल्हान के लोकप्रिय नेता रामदास सोरेन अब इस दुनिया में नहीं रहे. आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर झारखंड उन्हें उसी सम्मान और भावुकता के साथ याद कर रहा है.

रामदास सोरेन का राजनीतिक सफर सिर्फ विधायक और मंत्री बनने तक सीमित नहीं था. उनकी पहचान सबसे पहले एक समाजसेवी और मांझी बाबा के रूप में बनी. घोड़ाबांधा गांव में 1 जनवरी 1962 को जन्मे रामदास सोरेन को नेतृत्व की सीख परिवार से मिली. उनके दादा गांव के मांझी थे, उनके बाद पिता ने यह जिम्मेदारी संभाली और फिर यह परंपरा रामदास सोरेन तक पहुंची. गांव के सामाजिक मामलों को सुलझाना हो, लोगों के बीच विवाद खत्म कराना हो या धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाना हो, रामदास सोरेन हमेशा लोगों के बीच मौजूद रहते थे. जरूरतमंदों की मदद और समाज के हित में खड़े रहना उनकी पहचान बन गई. यही जनसेवा धीरे-धीरे उन्हें राजनीति की ओर ले गई.

झामुमो से जुड़कर शुरू किया लंबा राजनीतिक संघर्ष
रामदास सोरेन ने वर्ष 1980 में झारखंड मुक्ति मोर्चा की प्राथमिक सदस्यता ली. इसके बाद उन्होंने झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. संगठन में उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई और वह चार बार झामुमो के जिलाध्यक्ष रहे. चुनावी राजनीति में उनका पहला कदम 1995 में पड़ा. उन्होंने जमशेदपुर पूर्वी से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा, जहां उनका मुकाबला रघुवर दास से हुआ, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. वर्ष 2005 में उन्होंने घाटशिला विधानसभा सीट से भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, मगर सफलता नहीं मिली. आखिरकार 2009 में झामुमो ने उन पर भरोसा जताया और पार्टी के टिकट पर रामदास सोरेन ने पहली बार घाटशिला से जीत दर्ज की. हालांकि 2014 में उन्हें भाजपा के लक्ष्मण टुडू से हार मिली, लेकिन 2019 और 2024 में उन्होंने लगातार दो बार घाटशिला सीट जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की.

मंत्री बने तो शिक्षा और आदिवासी हितों पर दिखाया विजन
30 अगस्त 2024 को रामदास सोरेन पहली बार हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री बने. उन्हें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा और जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी मिली. हालांकि यह कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चला. विधानसभा चुनाव के बाद 5 दिसंबर 2024 को उन्हें स्कूली शिक्षा मंत्री बनाया गया. स्कूली शिक्षा विभाग संभालने के बाद उन्होंने कई योजनाओं पर काम शुरू किया. उनके कार्यकाल में 26 हजार सहायक आचार्य पदों पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ी. स्कूल रुआर अभियान के जरिए 5 से 18 वर्ष तक के बच्चों का शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करने की कोशिश की गई.

रामदास सोरेन अधिकारियों को सिर्फ दफ्तरों में बैठकर काम करने के बजाय स्कूलों तक पहुंचने की सलाह देते थे. उन्होंने डीईओ और डीएसई को हर महीने किसी एक स्कूल का निरीक्षण करने, बच्चों से संवाद करने और कक्षा में जाकर पढ़ाने का निर्देश दिया था. घाटशिला के हैदलजुड़ी में पंडित रघुनाथ मुर्मू विश्वविद्यालय और ट्राइबल म्यूजियम की नींव रखना भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण पहल रही. स्थानीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण को लेकर भी वह गंभीर थे. उन्होंने 10 हजार स्थानीय एवं जनजातीय भाषा शिक्षकों की बहाली का प्रस्ताव तैयार कराया था.

2 अगस्त 2025 को रामदास सोरेन के सिर में गंभीर चोट लगी थी. इसके बाद उन्हें इलाज के लिए दिल्ली ले जाया गया. करीब 10 दिनों तक इलाज और दुआओं का दौर चला, लेकिन 15 अगस्त को उनके निधन की खबर ने पूरे झारखंड को झकझोर दिया. यह वह दौर भी था जब झारखंड कुछ ही दिन पहले अपने वरिष्ठ नेता और गुरुजी के निधन के सदमे से गुजर रहा था. ऐसे में रामदास सोरेन के असमय निधन ने झामुमो और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी गहरा आघात पहुंचाया.

रामदास सोरेन के निधन के बाद नवंबर 2025 में घाटशिला विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. झामुमो ने उनके बड़े बेटे सोमेश सोरेन को मैदान में उतारा. उन्होंने चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन को हराकर बड़ी जीत दर्ज की. यह परिणाम सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि रामदास सोरेन के प्रति लोगों के भरोसे और उनके परिवार से जुड़ी राजनीतिक विरासत का भी संकेत माना गया. आज उनके जाने के एक साल बाद भी कोल्हान की राजनीति और सामाजिक जीवन में उनकी कमी महसूस होती है. रामदास सोरेन के लिए पद और सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण समाज और अपने लोगों की सेवा थी. मांझी बाबा से विधायक और फिर मंत्री तक का उनका सफर बताता है कि जमीन से जुड़ा नेतृत्व किस तरह लोगों के दिलों में जगह बनाता है. यही वजह है कि रामदास सोरेन आज भी सिर्फ एक दिवंगत नेता नहीं, बल्कि कोल्हान की सामाजिक और राजनीतिक स्मृति का अहम हिस्सा हैं.