रांची (RANCHI): झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की कथित गड़बड़ियों के खिलाफ सीआईडी की कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है. JPSC मेधा घोटाला मामले में अब तक 20 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है, जबकि जांच में सामने आए सात आरोपी अभी भी फरार हैं. फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए सीआईडी लगातार उनके संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है. अगर आरोपी जल्द पुलिस के सामने नहीं आते हैं तो उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट के साथ-साथ कुर्की-जब्ती की कार्रवाई की तैयारी की जा रही है.
JPSC की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान सीआईडी को परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े लोगों और कथित सिंडिकेट के बीच संपर्क के संकेत मिले हैं. जांच में परीक्षा कराने वाली एजेंसी से जुड़े लोगों की भूमिका भी सामने आई है. इसी कड़ी में परीक्षा एजेंसी के अकाउंटेंट रक्षक सिंह को लखनऊ से गिरफ्तार किया गया था. आरोप है कि वह 14वीं JPSC पीटी परीक्षा कराने वाली एजेंसी से जुड़ा था और खुद भी परीक्षा में सफल हुआ था. सीआईडी की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी है. जांच में सामने आए सात फरार आरोपियों में रांची के आदित्य पांडे और पवन कुमार सिंह, पलामू के रविशंकर कुमार और संतोष कुमार सिंह, बोकारो के सनंद प्रकाश, हजारीबाग के लालू कुमार यादव और गिरिडीह के सौरभ कुमार पांडे के नाम सामने आए हैं. इनके ठिकानों पर पहले भी छापेमारी की जा चुकी है.
JSSC-CGL पर भी CID की नजर
JPSC के बाद अब सीआईडी ने JSSC-CGL परीक्षा में कथित गड़बड़ी की जांच भी तेज कर दी है. 2023-24 में आयोजित CGL परीक्षा में पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितता के आरोपों की जांच के लिए SIT बनाई गई है. जांच के दौरान सफल अभ्यर्थियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई है. हाल में चार सफल अभ्यर्थियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि इस मामले में अब तक कई अभ्यर्थियों से पूछताछ की जा चुकी है. सीआईडी अब तक 250 से अधिक अभ्यर्थियों से पूछताछ कर चुकी है और करीब 100 अभ्यर्थियों को संदिग्ध मानकर उनकी भूमिका की पड़ताल की जा रही है. एजेंसी परीक्षा से जुड़े दस्तावेज, कॉल डिटेल और डिजिटल साक्ष्यों को भी खंगाल रही है.
इस पूरे मामले ने झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. JPSC और JSSC दोनों मामलों में जांच आगे बढ़ने के साथ अब यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि कथित गड़बड़ी केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित थी या इसके पीछे परीक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों का बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था.
