Jharkhand

पलामू: सदर अस्पताल में डिजिटल सिग्नेचर का कथित फर्जीवाड़ा, 33 जन्म प्रमाण पत्र रद्द

Rashmi Prasad
Rashmi Prasad
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पलामू (PALAMU): पलामू सदर अस्पताल में डिजिटल सिग्नेचर के फर्जीवाड़े को लेकर एक मामला सामने आया है. सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. विजय कुमार के डिजिटल सिग्नेचर का कथित रूप से गलत इस्तेमाल कर 33 जन्म प्रमाण पत्र जारी किया गया है. प्रमाण पत्र तैयार होने के बाद उनका वितरण भी कर दिया गया था. मामला सामने आने के बाद सभी 33 प्रमाण पत्र रद्द कर दिए गए हैं. उपाधीक्षक के आवेदन पर मेदिनीनगर टाउन थाना में प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. अस्पताल में जन्म प्रमाण पत्र बनाने के लिए कंप्यूटर ऑपरेटर अमित कुमार को जिम्मेदारी दी गई है. काम का दबाव अधिक होने के कारण बिश्रामपुर निवासी शिवनारायण साव को भी पोर्टल आईडी उपलब्ध कराई गई थी. जांच के दौरान शिवनारायण साव के कार्यकाल और पोर्टल पर की गई गतिविधियों की पड़ताल में डिजिटल सिग्नेचर के कथित दुरुपयोग की बात सामने आई.

मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर डिजिटल सिग्नेचर का वास्तविक इस्तेमाल किसने किया. सिर्फ पोर्टल आईडी किस व्यक्ति के पास थी, यह पता लगाने से पूरी सच्चाई सामने नहीं आएगी. पुलिस को पोर्टल लॉगिन, सिस्टम रिकॉर्ड, डिजिटल सिग्नेचर के इस्तेमाल का समय और संबंधित तकनीकी जानकारी की गहराई से जांच करनी होगी. इससे यह पता चल सकता है कि प्रमाण पत्र किस सिस्टम से और किसके जरिए जारी किए गए. जन्म प्रमाण पत्र में फर्जीवाड़े का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले मेराल में ऑनलाइन सेंटर से फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाने का मामला सामने आया था, जिसमें मेदिनीनगर कनेक्शन की बात भी सामने आई थी. वहीं, कचहरी परिसर के ऑनलाइन सेंटर से फर्जी प्रमाण पत्र बरामद होने और मेदिनीनगर निगम के कंप्यूटर ऑपरेटर पर जन्म प्रमाण पत्र के नाम पर अवैध वसूली के आरोप का मामला भी सामने आ चुका है.

इन पुराने मामलों के बावजूद अब सदर अस्पताल में 33 प्रमाण पत्रों के कथित फर्जीवाड़े ने व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं. जांच के सामने अब चुनौती सिर्फ प्रमाण पत्र रद्द करने या पोर्टल आईडी धारक तक पहुंचने की नहीं, बल्कि पूरे मामले की वास्तविक जिम्मेदारी तय करने की है. पुलिस को यह भी देखना होगा कि डिजिटल सिग्नेचर तक किसकी पहुंच थी, प्रमाण पत्र जारी करने में किन लोगों की भूमिका रही और क्या इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था. अगर जांच सिर्फ छोटे कर्मचारियों तक सीमित रही तो कई अहम सवाल अनुत्तरित रह सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि तकनीकी रिकॉर्ड से लेकर प्रमाण पत्र जारी होने और वितरण तक की पूरी प्रक्रिया की जांच हो, ताकि असली दोषियों की पहचान हो सके.