जमशेदपुर (JAMSHEDPUR): पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया में स्थित कोलकाता पिंजरापोल सोसाइटी द्वारा संचालित ऐतिहासिक गौशाला इन दिनों गंभीर संकट का सामना कर रही है. कभी झारखंड की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित गौशालाओं में गिनी जाने वाली यह संस्था अब जंगली हाथियों के लगातार उत्पात से अस्तित्व के संकट में पहुंच गई है. इसका सबसे बड़ा कारण जंगली हाथियों को माना जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों से हाथियों का झुंड गौशाला परिसर में जमा है. हाथियों के कारण यहां की खेती-बाड़ी बुरी तरह प्रभावित हुई है. गौशाला परिसर में उगाई जाने वाली आम, मकई, कटहल समेत कई फसलें हाथी हर साल नष्ट कर रहे है. इतना ही नहीं, गायों के चारे के लिए तैयार की गई घास और अन्य चारा फसलें भी हाथियों के पैरों तले रौंदी जा रही हैं. हाथियों के झुंड द्वारा गौशाला की चहारदीवारी और अन्य संरचनाओं को भी नुकसान पहुंचाया जा रहा है. हाथी दीवार तोड़कर परिसर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे संपत्ति को भारी क्षति होती है. प्रबंधन का कहना है कि हाथियों के कारण हर वर्ष लाखों रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है. यहां की 470 गायों के समक्ष भी चारा का संकट उत्पन्न हो गया है. गौशाला का बड़ा हिस्सा अब हाथियों की आवाजाही का मार्ग बन गया है. इससे कर्मचारियों और पशुओं की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ गई है. झारखंड की इस ऐतिहासिक गौशाला के सामने खड़ा यह संकट अब केवल आर्थिक नुकसान का नहीं, बल्कि इसकी विरासत और अस्तित्व को बचाने का भी सवाल बन गया है.
हाथियों के उत्पात से आधी रह गई आमदनी
कभी अपनी कृषि उपज के लिए पहचान रखने वाली गौशाला आज जंगली हाथियों के बढ़ते उत्पात से गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रही है. गौशाला में उत्पादित आम, मकई, कटहल समेत अन्य फसलें न केवल स्थानीय बाजारों में बल्कि दूसरे राज्यों तक भेजी जाती थीं. इन फसलों की बिक्री से होने वाली आय से गौशाला में रह रहे मवेशियों के लिए चारा, भोजन, दवाइयों और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाती थी. कर्मचारियों का मानदेय भी इसी आय से दिया जाता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हाथियों के लगातार हमलों ने इस व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. हाथियों के झुंड खेती को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ फलों और चारे की फसलों को भी पूरी तरह नष्ट कर रहे हैं. इसका सीधा असर गौशाला की आय पर पड़ा है. गौशाला प्रबंधन के अनुसार एक समय संस्था का वार्षिक टर्नओवर करीब 8.50 लाख रुपये हुआ करता था, जो अब घटकर लगभग 4 लाख रुपये तक सिमट गया है. वर्तमान में चार हाथियों का झुंड कई दिनों से गौशाला परिसर में डेरा डाले हुए है. इस वर्ष भी हाथियों ने आम और कटहल की पूरी फसल बर्बाद कर दी. गौशाला परिसर में विभिन्न प्रजातियों के करीब 550 आम के पेड़ हैं, पेड़ों पर लगी लगभग पूरी फसल हाथियों के कारण नष्ट हो गई. लगातार हो रहे नुकसान से गौशाला प्रबंधन की चिंता बढ़ गई है और संस्था के भविष्य पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं.
मकई की खेती पूरी तरह बंद
जंगली हाथियों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि यहां की मकई की खेती पूरी तरह बंद करनी पड़ गई है. गौशाला के कर्मी वीरेंद्र गिरी के अनुसार पिछले छह महीनों से मकई की बुआई नहीं की जा रही है, क्योंकि फसल तैयार होने से पहले ही हाथियों का झुंड खेतों में पहुंचकर उसे नष्ट कर देता है. लगातार हो रहे नुकसान के कारण प्रबंधन ने फिलहाल मकई की खेती रोक दी है. उन्होंने बताया कि मकई की बिक्री से गौशाला को हर महीने लगभग 50 हजार रुपये की आमदनी होती थी. इस वर्ष हाथियों के कारण आम की फसल को भी भारी नुकसान हुआ है. 3.50 लाख रुपये मूल्य की आम की फसल हाथियों ने बर्बाद कर दी. वहीं कटहल की फसल नष्ट होने से लगभग 50 हजार रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ है. फसलों के अलावा हाथियों ने गौशाला की संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया है. कई स्थानों पर चहारदीवारी भी हाथियों ने तोड़ दिया है. लगातार हो रहे आर्थिक नुकसान और बढ़ते खतरे ने गौशाला प्रबंधन की चिंता बढ़ा दी है.
वन विभाग के सहयोग नहीं मिलने से बढ़ी परेशानी
चाकुलिया गौशाला प्रबंधन का आरोप है कि पिछले तीन वर्षों से जंगली हाथियों के लगातार उत्पात के बावजूद वन विभाग की ओर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है. नुकसान के अनुरूप मुआवजा नहीं दिया गया है. हाथियों को स्थायी रूप से गौशाला परिसर से दूर रखने के लिए भी कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं की गई है. गौशाला के सचिव आलोक लोधा ने बताया कि हाथियों के कारण संस्था को हर साल लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. वन विभाग की ओर से अब तक केवल एक बार 5 हजार रुपये का मुआवजा दिया गया है. उन्होंने कहा कि हाथियों के आने की सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंचती है और उन्हें खदेड़ती है. लेकिन यह केवल अस्थायी समाधान साबित हो रहा है. कुछ दिनों बाद हाथियों का झुंड फिर से गौशाला परिसर में प्रवेश कर जाता है. हाथियों का प्रवेश परिसर में रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. इसका परिणाम यह है कि फसलों और संपत्तियों को लगातार नुकसान पहुंच रहा है. आलोक लोधा ने कहा कि हाथियों के उत्पात के कारण गौशाला की आय भी पहले की तुलना में आधी रह गई है. जिससे संस्था के संचालन और मवेशियों की देखभाल पर असर पड़ रहा है. गौशाला फिलहाल डोनेशन पर चल रहा है.
111 साल पुराना है चाकुलिया गौशाला
इस गौशाला का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है. वर्ष 1916 में स्थापित इस गौशाला ने पिछले 111 वर्षों में पशु संरक्षण और गौसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. लंबे समय तक इसे झारखंड की सबसे बड़ी गौशालाओं में गिना जाता रहा है. विशाल परिसर, सैकड़ों मवेशियों की देखभाल और कृषि आधारित आत्मनिर्भर व्यवस्था इसकी प्रमुख पहचान रही है. एक समय यह संस्था अपनी सुव्यवस्थित व्यवस्था और उत्पादन क्षमता के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध थी. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से जंगली हाथियों के लगातार उत्पात ने इस ऐतिहासिक संस्थान के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. फसलों, बागानों और आधारभूत संरचनाओं को हो रहे नुकसान के कारण गौशाला की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है. ऐसे में 111 वर्षों की इस गौरवशाली विरासत के अस्तित्व को बचाने की चुनौती अब पहले से कहीं अधिक बड़ी हो गई है
