Jharkhand

शहादत दिवस विशेष: कौन थे शहीद निर्मल महतो, कब और क्यों हुई उनकी हत्या, जानिए

Rohit Kumar Sr. Correspondent
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जमशेदपुर (JAMSHEDPUR): आज जमशेदपुर समेत पूरा राज्य झारखंड आंदोलनकारी और जेएमएम के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष शहीद निर्मल महतो का शहादत दिवस मना रहा है. हर साल जमशेदपुर के कदमा स्थित उलियान में उनका शहादत दिवस मनाया जाता है. श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है. आज भी उनका शहादत दिवस मनाया जाएगा. राज्य के सीएम हेमंत सोरेन भी इसमें शामिल हो सकते है. सीएम के अलावा कई मंत्री और विधायक भी उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचेंगे. आज ही के दिन 8 अगस्त को निर्मल महतो की हत्या की गई थी. उनकी हत्या एक राजनीतिक साजिश मानी है थी. निर्मल महतो कदमा के उलियान के रहने वाले थे. उनकी हत्या के बाद झारखंड आंदोलन और तेज हो गया था. हर साल 8 अगस्त को उलियान में बने उनके समाधि स्थल पर काफी संख्या में लोग पहुंच श्रद्धांजलि देते है. 

बिस्टुपुर में अपराधियों ने मारी थी गोली
8 अगस्त 1987 को निर्मल महतो की हत्या बिष्टुपुर थाना क्षेत्र में हुई थी. बिस्टुपुर स्थित चमरिया गेस्ट हाउस के बाहर वे अपने सहयोगियों के साथ बात कर रहे थे, इसी दौरान अपराधियों ने उन्हें गोली मार दी थी. उस वक्त वे मात्र 37 साल के थे. लोग निर्माण महतो को प्यार से निर्मल दा बुलाते थे. उनकी शहादत ने झारखंड अलग राज्य के आंदोलन को नई ऊर्जा भर दी थी. उनकी हत्या की जांच का जिम्मा सरकार ने सीबीआई को सौंपी थी. उनकी हत्या में धीरेंद्र सिंह, नागेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह को गिरफ्तार किया गया था. धीरेन्द्र सिंह को 2001 में तो नागेंद्र सिंह को 2003 में गिरफ्तार किया गया था. वहीं, एक आरोपी वीरेंद्र सिंह की मौत जेल में ही हो गई थी. निर्मल महतो की हत्या की प्राथमिकी झामुमो के तत्कालीन नेता सूरज मंडल के बयान पर दर्ज की गई थी. निर्मल महतो का जन्म 25 दिसंबर 1950 में हुआ था.


अलग राज्य आंदोलन में निर्मल दा की भूमिका थी अहम
झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में निर्मल महतो की भूमिका अहम मानी जाती है.1980 में वे झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हुए. उन्हें केंद्रीय अध्यक्ष बनाया गया. निर्मल दा ने युवाओं को अलग राज्य आंदोलन से जोड़ने के लिए आजसू के गठन में भी एहम भूमिका निभाई. वे सामाजिक कामों में भी काफी सक्रिय थे. उन्होंने सूदखोरों के खिलाफ भी आंदोलन चलाया था. बताया जाता है कि राजनीतिक साजिश और उनकी बढ़ती राजनीतिक-क्षेत्रीय सक्रियता के चलते उनकी हत्या कराई गई थी. छोटानागपुर क्षेत्र में झामुमो के बढ़ते प्रभाव और उनके नेतृत्व से राजनीतिक विरोधियों की असहजता बढ़ी थी. इस कारण उनकी हत्या एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश माना गया. उनकी हत्या के बाद पूरे प्रदेश में भारी आक्रोश फैला था और झारखंड आंदोलन को एक नई दिशा व आक्रामकता मिली थी.