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Jharkhand

हुनर है, मेहनत है… फिर भी ठिकाना नहीं; मोबाइल की रोशनी में तीन बच्चों का भविष्य संवारती मां

Pancham Jha Dumka
Pancham Jha Dumka
Senior News Publisher • TheNewsPost.in

दुमका(DUMKA): हर व्यक्ति को सरकारी नौकरी देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है. यही वजह है कि सरकारें कौशल विकास और स्वरोजगार को बढ़ावा देने की बात करती हैं. झारखंड में महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आजीविका के लिए झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी यानी जेएसएलपीएस जैसी योजनाएं संचालित हैं. इनका उद्देश्य गरीब परिवारों को आजीविका से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाना है. लेकिन सवाल यही है कि योजनाएं कागज से निकलकर उन हाथों तक कब पहुंचेंगी, जो सचमुच अपने हुनर से जिंदगी बदलना चाहते हैं?

असमय पति की मौत, बच्चों की जिम्मेदारी मां के कंधों पर

झारखंड की उपराजधानी दुमका से सामने आई यह कहानी एक ऐसी मां की है, जिसने विपरीत परिस्थिति में हार मानने के बजाय अपने हुनर को हथियार बनाया. वर्षों पहले पति का निधन हो गया. दो बेटियों और एक बेटे की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी रेजिना मुर्मू के कंधों पर आ गई. सरकारी विधवा पेंशन मिलती है, लेकिन उससे परिवार का गुजारा संभव नहीं था. इसके बावजूद बच्चों को पढ़ाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने का संकल्प उन्होंने नहीं छोड़ा.

ऊन के धागों से बुनी आत्मनिर्भरता की कहानी

रेजिना ने किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपनी कला को रोजगार बनाया. ऊन खरीदकर घर में ही सजावटी और अन्य हस्तनिर्मित सामान तैयार करने लगीं. धीरे-धीरे उन्होंने विलुप्त होती ऊलन हैंडीक्राफ्ट कला को अपने स्तर पर जीवित रखने की कोशिश शुरू की. गांव में उनके उत्पादों के खरीददार नहीं मिले तो उन्होंने दुमका शहर का रुख किया.

हर रविवार टिन बाजार में सजती है संघर्ष की दुकान

शहर के टिन बाजार चौक पर हर रविवार रेजिना की छोटी सी टेबल सजती है. यही टेबल उनके परिवार की अतिरिक्त आमदनी और बच्चों के भविष्य की उम्मीद बनी हुई है. लेकिन विडंबना यह है कि सप्ताह में सिर्फ एक दिन उन्हें यहां बैठकर अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिलता है.

 

मोबाइल की रोशनी में गुलजार होता मां-बेटी का बाजार

रेजिना की बेटी अस्मिता टुडू भी मां के संघर्ष में बराबर की भागीदार है. शहरी चकाचौंध से दूर एक छोटी सी टेबल पर मां बेटी अपने हस्तनिर्मित उत्पाद सजाती हैं. शाम ढलने के बाद जब रोशनी कम पड़ती है तो मोबाइल की टॉर्च ही उनकी दुकान की रोशनी बन जाती है. अस्मिता के मुताबिक, बाकी दिनों में बाजार की दुकानें खुली रहने के कारण दुकानदार उन्हें जगह नहीं देते.

मुफ्त मदद नहीं, सिर्फ काम करने की जगह चाहिए

रेजिना की मांग किसी मुफ्त सहायता की नहीं है. वह अपने हुनर के दम पर कमाना चाहती हैं. जरूरत सिर्फ इतनी है कि प्रशासन उन्हें एक स्थायी दुकान या सुरक्षित बिक्री स्थल उपलब्ध करा दे, जहां वह रोज अपने हस्तनिर्मित उत्पाद बेच सकें. सवाल यह है कि जब सरकार महिला स्वावलंबन और आजीविका की योजनाओं की बात करती है, तो ऐसी मेहनतकश महिला उन योजनाओं की पहुंच से बाहर क्यों है?

एक दुकान मिले तो बदल सकती है तस्वीर

मां-बेटी की मांग छोटी जरूर है, लेकिन उसका असर बड़ा हो सकता है. एक स्थायी जगह मिलने से रेजिना को नियमित बाजार मिलेगा, आमदनी बढ़ेगी और परिवार की आर्थिक उन्नति होगी. एक छोटी सी दुकान शायद उस मां के लिए सिर्फ दुकान नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का स्थायी दरवाजा साबित हो सकती है.

गरीबी के बावजूद बेटी ने नहीं छोड़ी पढ़ाई

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अस्मिता ने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की है. अब कुछ दिनों बाद वह जीएनएम का कोर्स करने धनबाद जाएगी. मां के संघर्ष ने बेटी को भी मेहनत और आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया है. शहर के लोग भी मां बेटी के जज्बे की सराहना करते हैं. रेजिना और अस्मिता की मांग बेहद सीधी है—काम करने के लिए एक छोटी-सी जगह. अब सवाल यही है कि महिला सशक्तिकरण और आजीविका की योजनाओं के बीच इस मेहनतकश मां-बेटी की आवाज संबंधित विभाग और प्रशासन तक कितनी मजबूती से पहुंचती है.

मोबाइल की रोशनी से सरकारी मदद की रोशनी तक

आज टिन बाजार की छोटी सी टेबल पर मोबाइल की रोशनी में रेजिना अपने उत्पाद बेच रही हैं. हाथों में हुनर है, मेहनत करने का जज्बा है और बच्चों को आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति भी. जरूरत सिर्फ एक अवसर की है. यदि व्यवस्था उस अवसर का दरवाजा खोल दे, तो शायद हर रविवार लगने वाली यह छोटी-सी दुकान एक दिन एक महिला की स्थायी आजीविका की पहचान बन जाए.

रिपोर्ट: पंचम झा