दुमका (DUMKA): एक तरफ सरकार 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा देती है, दूसरी तरफ दुमका के काठीकुंड में नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या की घटना सभ्य समाज के माथे पर ऐसा कलंक लगा गई है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा. घटना के चार दिन बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने से लोगों का आक्रोश गहराता जा रहा है. सवाल यह है कि बेटियों की सुरक्षा के बड़े बड़े दावे आखिर जमीन पर कहां खड़े हैं? जब एक नाबालिग को सुरक्षा नहीं मिल सकी, तो सरकारी नारों की सार्थकता पर सवाल उठना लाजिमी है.
नवरात्र में देवी की आराधना, न्याय के लिए बेटियों का संघर्ष
एक ओर शारदीय नवरात्र में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आराधना हो रही है. मंदिरों से लेकर पूजा पंडालों तक या देवी सर्वभूतेषु के मंत्र गूंज रहे हैं. बेटियों को देवी का स्वरूप मान कर कन्या पूजन किया जा रहा है. दूसरी ओर उसी समाज में एक बेटी को न्याय दिलाने के लिए सैकड़ों बेटियों को सड़क पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है. यह विरोधाभास केवल सामाजिक संवेदनहीनता का सवाल नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था और सामूहिक चेतना के सामने खड़ा एक कड़वा सच भी है. देवी की पूजा के बीच एक पीड़िता के लिए न्याय की गुहार आखिर इतनी लंबी क्यों हो रही है?
आदिवासी समाज की राजनीति, लेकिन पीड़िता के लिए राजनीतिक आवाज कहां?
संताल परगना की राजनीति में आदिवासी समाज की भूमिका हमेशा अहम रही है. आदिवासी हितों, अस्मिता और अधिकारों की बात करने वाले राजनीतिक दलों की यहां कमी नहीं है. लेकिन काठीकुंड की इस घटना पर अब तक अधिकांश राजनीतिक दलों की ओर से सड़क पर उतरकर विरोध जताने की बात तो दूर, सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी नजर नहीं आई है. राजद को छोड़कर अन्य दलों की ओर से मुखर विरोध सामने नहीं आने पर सवाल उठ रहे हैं. क्या आदिवासी समाज के हितों की राजनीति केवल चुनावी मंचों तक सीमित है? पीड़िता को न्याय दिलाने का सवाल क्या राजनीतिक प्राथमिकताओं में जगह नहीं पाता?
जिला परिषद अध्यक्ष पहुंचीं, बाकी जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता पर सवाल
घटना की सूचना मिलने के बाद जिला परिषद अध्यक्ष जायस बेसरा, जो सांसद नलिन सोरेन की पत्नी और शिकारीपाड़ा विधायक आलोक सोरेन की मां हैं, पीड़ित परिवार के साथ खड़ी नजर आईं. लेकिन उनके अलावा अन्य जनप्रतिनिधियों की ओर से अपेक्षित सक्रियता दिखाई नहीं देने पर सवाल उठ रहे हैं. आश्चर्यजनक यह भी है कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की ओर से भी अब तक कोई प्रभावी विरोध सामने नहीं आया है. लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं होती, ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना और जवाबदेही तय करने की मांग करना भी उसका दायित्व है. फिर इस मामले में राजनीतिक आवाजें इतनी धीमी क्यों हैं?
दूसरे राज्यों में आदिवासी उत्पीड़न पर मुखरता, अपने घर में खामोशी क्यों?
देश के दूसरे हिस्सों में आदिवासी समाज पर अत्याचार की घटनाएं सामने आने पर दुमका में राजनीतिक बयानबाजी और विरोध की आवाजें अक्सर सुनाई देती हैं. लेकिन अपने ही क्षेत्र में एक आदिवासी नाबालिग की दुषकर्म और हत्या के मामले में ऐसी खामोशी क्यों? दूसरों की घटनाओं पर आंसू बहाना आसान है, लेकिन अपने क्षेत्र में पीड़ित परिवार के साथ खड़े होकर न्याय की मांग करना ही वास्तविक संवेदनशीलता की कसौटी है. राजनीतिक दलों की यह चुप्पी अब सवालों के घेरे में है. आखिर इंसाफ की मांग भी क्या राजनीतिक सुविधा देखकर उठाई जाएगी?
सड़क पर छात्र संगठन, बढ़ रहा पुलिस पर दबाव
घटना के विरोध में विभिन्न छात्र संगठनों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा है. झारखंड छात्र सभा और छात्र समन्वय समिति के प्रदर्शन के बाद मंगलवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से भी कैंडल मार्च निकालने की घोषणा की गई है. लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों से पुलिस पर आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी का दबाव बढ़ रहा है. लोगों की मांग स्पष्ट है कि मामले का जल्द खुलासा हो, दोषियों की पहचान कर गिरफ्तारी की जाए और पीड़िता को न्याय मिले.
एसआईटी गठित, अब नतीजों से साबित करनी होगी कार्रवाई की गंभीरता
पुलिस ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया है. दुमका से लेकर पाकुड़ तक के पुलिस पदाधिकारी को इसमें शामिल किया गया है. जांच जारी है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही आरोपियों तक पहुंचा जा सकेगा. हालांकि, केवल एसआईटी गठित करना या जांच जारी होने की जानकारी देना पर्याप्त नहीं होगा. पुलिस को साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तार करना होगा और ऐसा मजबूत मामला तैयार करना होगा, जिससे अदालत में दोष सिद्ध हो सके तथा दोषियों को कानून के तहत कड़ी सजा मिले.
नारे नहीं, बेटियों को सुरक्षा और पीड़िता को न्याय चाहिए
काठीकुंड की घटना ने सरकार, प्रशासन, राजनीतिक दलों और समाज सभी के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. बेटी बचाने के नारे तभी सार्थक होंगे, जब बेटियां वास्तव में सुरक्षित हों. नवरात्र में कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब किसी बेटी के साथ अन्याय होने पर पूरा समाज उसके पक्ष में खड़ा हो. और आदिवासी हितों की राजनीति तभी विश्वसनीय होगी, जब संकट की घड़ी में राजनीतिक दल बयान जारी करने या चुप रहने के बजाय न्याय की लड़ाई में अपनी जिम्मेदारी निभाएं. अब दुमका को नारों और आश्वासनों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई का इंतजार है.
रिपोर्ट : पंचम झा
