दुमका (DUMKA): 15 अगस्त यानी भारत का स्वतंत्रता दिवस. वर्षों की गुलामी के बाद 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ. इस आजादी के लिए हमारे पुरखों ने लाठियां खाईं, यातनाएं सहीं और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया. उनके बलिदान के पीछे एक ही उम्मीद थी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बेहतर हो और देश तरक्की की राह पर आगे बढ़े. लेकिन स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी कई बुनियादी सवाल आज हमारे सामने खड़े हैं.
देशभक्ति के रंग में रंगा उपराजधानी दुमका
पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा है. झारखंड की उपराजधानी दुमका में भी स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. सुबह से शहर में देशभक्ति गीत गूंजते रहे और महापुरुषों की जय-जयकार होती रही. पुलिस लाइन मैदान में आयोजित मुख्य समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने ध्वजारोहण किया. राज्यपाल के कार्यक्रम को लेकर जिला प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद नजर आया.
सजावट में कोई कसर नहीं, लेकिन सफाई पर सवाल!
राष्ट्रीय पर्व के मौके पर दुमका को दुल्हन की तरह सजाया गया. सरकारी भवनों से लेकर प्रमुख सड़कों तक रंग-बिरंगी रोशनी से शहर को सजाया गया. रात में तिरंगे के रंगों से नहाया दुमका बेहद खूबसूरत नजर आया. लेकिन इस चमक-दमक के बीच शहर की सफाई व्यवस्था ने प्रशासन और नगर परिषद की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.
राज्यपाल के रास्ते चमकाए, बाकी शहर को क्यों छोड़ा?
राज्यपाल के आगमन को लेकर एयरपोर्ट से लोक भवन और पुलिस लाइन मैदान तक जाने वाले मार्ग को विशेष रूप से सजाया-संवारा गया. सड़क किनारे की झाड़ियों तक साफ कर दी गईं. महापुरुषों की प्रतिमा स्थलों की सफाई हुई और प्रमुख स्थानों को रोशनी से जगमगाया गया. सवाल यह है कि जिस सफाई की जरूरत पूरे शहर को थी, वह केवल वीआईपी मार्ग तक ही क्यों सीमित रह गई?
ड्रोन शो से जगमगाया आसमान, जमीन पर दिखा कचरा
14 अगस्त की रात आउटडोर स्टेडियम में आयोजित ड्रोन शो ने आसमान को रंग-बिरंगी रोशनी से भर दिया. आसमान में उभरती तस्वीरों और आकृतियों ने लोगों का मन मोह लिया. ऐसा लगा मानो तारे जमीन पर उतर आए हों. लेकिन उसी दुमका की जमीन पर कई जगह कचरे के ढेर और गंदगी ने विकास और व्यवस्था की एक दूसरी तस्वीर भी सामने रखी.
यह दुमका की आधी नहीं, पूरी तस्वीर है
शहर की सजावट और रोशनी दुमका की खूबसूरत तस्वीर पेश कर रही थी, लेकिन इसे पूरी सच्चाई मान लेना ठीक नहीं होगा. किसी भी पर्व त्योहार पर लोग अपने घरों की सफाई करते हैं. स्वतंत्रता दिवस देश का राष्ट्रीय पर्व है. ऐसे में शहर की साफ सफाई की जिम्मेदारी किसकी है? दुमका में नगर परिषद है, अधिकारी हैं और कुछ महीने पहले ही जनता ने अपने प्रतिनिधियों को चुनकर शहर की सरकार बनाई है. इसके बावजूद यदि शहर के गली-मोहल्ले कचरे के ढेर से पटे हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है.
कचरे के ढेर पर फीका नहीं पड़ा देशभक्ति का जज्बा
गंदगी के बीच भी शहरवासियों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी. लोगों ने पूरे जोश के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया. लेकिन जनता के उत्साह के पीछे जिम्मेदार व्यवस्था से जुड़े सवाल भी उतने ही मजबूती से खड़े हैं. आखिर राष्ट्रीय पर्व के दिन भी यदि शहर साफ-सुथरा नहीं दिखे तो सामान्य दिनों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.
जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाने वाले संगठन खामोश क्यों?
दुमका में कई सामाजिक और जनहित से जुड़े संगठन समय-समय पर शहर की समस्याओं को प्रमुखता से उठाते रहे हैं. सफाई, सड़क, जलजमाव और नागरिक सुविधाओं को लेकर आवाज भी उठती रही है. ऐसे में सवाल यह भी है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर इन संगठनों की आवाज क्यों कमजोर पड़ गई?
जनप्रतिनिधियों के दावों की भी परीक्षा
सवाल निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से भी है. विधायक बसंत सोरेन ने दुमका को उपराजधानी का वास्तविक दर्जा दिलाने का वादा किया है. वहीं नगर परिषद अध्यक्ष अभिषेक चौरसिया ने सफाई के मामले में दुमका शहर को इंदौर जैसा बनाने का दावा किया था. ऐसे में सवाल सीधा है, जब राष्ट्रीय पर्व के मौके पर भी शहर के कई गली-मोहल्लों में गंदगी का अंबार नजर आए तो इन दावों की हकीकत आखिर कहां खड़ी होती है?
वीआईपी सफाई बनाम आम जनता की उपेक्षा?
राज्यपाल के दुमका दौरे को लेकर जिला प्रशासन की ओर से की गई विशेष व्यवस्था को पूरी तरह जायज ठहराया जा सकता है. हमारी संस्कृति में ‘अतिथि देवो भवः’ की परंपरा रही है और राज्यपाल राज्य के प्रथम नागरिक होते हैं. लेकिन शहरवासी भी इसी देश के नागरिक हैं और उनके लिए भी स्वच्छ एवं सम्मानजनक शहर जरूरी है. फिर सफाई व्यवस्था में यह अंतर क्यों? क्या किसी शहर को सुंदर दिखाने के लिए सिर्फ वीआईपी के गुजरने वाले रास्ते को चमकाना पर्याप्त है?
स्वतंत्रता का असली अर्थ स्वच्छ और जवाबदेह व्यवस्था भी
आजादी केवल तिरंगा फहराने, रोशनी करने और देशभक्ति गीत बजाने तक सीमित नहीं है. स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ ऐसी व्यवस्था भी है, जिसमें नागरिकों को स्वच्छ वातावरण, बेहतर सुविधाएं और जवाबदेह प्रशासन मिले. दुमका की चमकती सड़कों और कचरे के ढेर के बीच खड़ा यह विरोधाभास जिम्मेदारों से एक सीधा सवाल पूछ रहा है, जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब दुमका के कई हिस्से गंदगी के ढेर पर क्यों खड़े थे?
सवाल अब जवाब मांगता है
स्वतंत्रता दिवस हर साल आएगा, तिरंगा फिर लहराएगा और शहर फिर रोशनी से जगमगाएगा. लेकिन जरूरत इस बात की है कि अगली बार दुमका की खूबसूरती केवल वीआईपी मार्गों तक सीमित न रहे. शहर के हर गली-मोहल्ले में स्वच्छता दिखाई दे. क्योंकि जनता को केवल सजाया हुआ शहर नहीं, बल्कि साफ, सुंदर और जवाबदेह दुमका चाहिए.
रिपोर्ट : पंचम झा
