दुमका : मां ने जैसे ही 13 साल बाद अपने बेटे अनिल मरिक को सामने देखा, आंखों से आंसुओं की धार निकल पड़ी. कांपते हाथों से बेटे को सीने से लगाया तो 13 वर्षों से भीतर दबा दर्द सिसकियों में बाहर आ गया. मां बार बार बेटे को निहारती रही, मानो उसे यकीन ही नहीं हो रहा हो कि जिस लाल की राह देखते देखते 13 साल गुजर गए, वह आज उसके सामने खड़ा है. एक मां की बांहों में उसका बेटा था और उन दोनों के बीच 13 वर्षों का लंबा इंतजाए आंसुओं में पिघल रहा था. यह सिर्फ मां बेटे का मिलन नहीं, बल्कि टूट चुकी उम्मीद के फिर से जिंदा होने का भावुक पल था.
13 साल पहले घर से निकला था अनिल, फिर नहीं मिली कोई खबर
यह भावुक कहानी रील नहीं बल्कि रीयल है. घटना दुमका जिला के जामा प्रखंड के हेठ रंगनी गांव की है. करीब 13 वर्ष पहले किशोरावस्था में अनिल मरिक किसी बात से नाराज होकर घर से निकल गया था. उसके बाद वह कहां गया, किन परिस्थितियों से गुजरा और किस हाल में रहा, इसकी जानकारी परिवार को नहीं थी. बेटे की कोई खबर नहीं मिलने के बावजूद मां की आंखें उसकी राह देखती रहीं.
जिंदगी ने मायानगरी तक पहुंचाया, वहां भी कम नहीं हुईं मुश्किलें
घर से निकलने के बाद अनिल ने दर बदर भटकते हुए जिंदगी की कई मुश्किलें झेलीं और आखिरकार मायानगरी मुंबई पहुंच गया. बताया जा रहा है कि रेलवे प्लेटफॉर्म पर लोगों ने उसे पॉकेटमार समझकर कथित रूप से पीट दिया. बाद में सड़कों पर भटकते हुए वह ‘अपना आश्रम’ संस्था के कार्यकर्ताओं की नजर में आया, जो उसे आश्रम लेकर पहुंचे.
दो साल के इलाज के बाद लौट आई याददाश्त
अपना आश्रम में करीब दो वर्षों तक इलाज और देखभाल के बाद अनिल की मानसिक स्थिति में सुधार हुआ. धीरे-धीरे उसकी याददाश्त वापस आने लगी और उसने अपना नाम व पता बताया. इसके बाद संस्था के प्रयास से उसके घर वालों को सूचना मिली कि उनका 13 साल से बिछड़ा बेटा मुंबई में सुरक्षित है.
बेटे की खबर ने दी खुशी, लेकिन गरीबी मुंबई जाने की राह में था बाधक
बेटे के जिंदा और सुरक्षित होने की खबर ने मां पवली देवी और पिता जीत नारायण मरीक की वर्षों पुरानी उम्मीद को फिर जगा दिया. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे मुंबई जाकर अपने बेटे को वापस ला सकें. बेटा मिल गया था, मगर उसे घर लाने की राह गरीबी ने रोक रखी थी.
जब बेबस परिवार के लिए मसीहा बनकर सामने आए मुखिया राजू पुजहर
परिवार की मजबूरी सामने आई तो सरसाबाद पंचायत के मुखिया राजू पुजहर मदद के लिए आगे आए. समाजसेवी आनंदी राउत के साथ उन्होंने अनिल के माता पिता को लेकर मुंबई जाने की पहल की. जामा विधायक डॉ. लुईस मरांडी समेत कई लोग परिवार के साथ खड़े रहे.
कागजी प्रक्रिया हुई पूरी और मां को मिल गया उसका लाल
मुंबई स्थित अपना आश्रम पहुंचकर आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी की गई. इसके बाद अनिल को उसके माता पिता को सौंप दिया गया. वर्षों से बेटे की राह देख रही मां ने उसे गले लगाया तो भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा. 13 वर्षों की जुदाई के बाद मां की बांहों में लिपटे बेटे का वह पल हर किसी की आंखें नम कर देने वाला था.
अब 13 साल बाद उसी घर में गूंजेगी बेटे की आवाज
अपना आश्रम को दिल से धन्यवाद देने के बाद अनिल अपने माता पिता के साथ दुमका के लिए ट्रेन से रवाना हो चुका है. 18 सितंबर तक उसके घर पहुंचने की संभावना है. जिस घर में 13 वर्षों से बेटे की कमी महसूस होती रही, अब उसी घर में फिर से अनिल की आवाज गूंजने वाली है.
राम का वनवास 14 वर्ष का था, अनिल का अज्ञातवास 13 साल में खत्म हुआ
भगवान राम का वनवास 14 वर्षों बाद समाप्त हुआ था. अनिल का अज्ञातवास 13 वर्षों बाद खत्म हुआ है. फर्क इतना है कि राम की वापसी देखने के लिए दशरथ जीवित नहीं थे, जबकि अनिल को वापस लाने के लिए उसके माता पिता खुद मुंबई पहुंचे और अब अपने बेटे को साथ लेकर घर लौट रहे हैं. 13 वर्षों की दूरी खत्म हुई है और एक मां की आंखों के सामने उसका लाल फिर अपने घर की ओर लौट रहा है.
रिपोर्ट पंचम झा
